भारतकोश
बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans

नरपति नाल्ह द्वारा

DevanagariHindipublished315 पृष्ठ

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  • ३६ - पूरब देसनउ¹ घयनठ² लोक। पान धूसारण्ड³ नउ⁴ लहइ⁵ भोग ॥ थण संघट्ट⁶ सुकय भयह । शक्ति चतुराई गढर ग्यालेर ॥ सामणी जेसलमेर री । स्वामी पुरुष भलागढ अजमेरि ॥ ४७ ॥ जनम दीपउ⁷ माहलइ देसि । राजकुंवरि⁸ अरू⁹ रूपि असोसि ॥ रूपि नइ¹⁰ रूपिन¹¹ मेदन । पहिरहइ¹² लोमड़ी¹³ झीणइ¹⁴ गूलकि ॥ १. अ० २ देसके, आ० ६ देसका । २. आ० ६ कचना, आ० ६ फलुहाओ, अ० पूरण्यौ । ३. आ० ६ फूलाकउ । ४+५. अ० २ तूं लहइ । ६. आ० ६ संघथै । यह छंद आ० ६ में ५१, आ० ६ खंड २ में ८, अ० २ खंड २ में ११ है । आ० १२ में नहीं है । अ० २ में इस छंद की छठी पंक्ति है— “भोगी लोक दक्षण को देस ।” तथा आ० ६ में है :—“भोगी लोक दक्षण के देस ।” ७. आ० ६ हूयो, अ० २ हूवड । ८. आ० ६ राजघरिणि । ९. अ० २ अति, आ० ६ नइ । १०+११. आ० ६ निरूपी । १२. आ० ६ पहिरणि, आ० ६, अ० २ आद्या । १३. अ० २, आ० ६ कापड़ । १४. आ० ६ जीणइ जी ।