भारतकोश
बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans

नरपति नाल्ह द्वारा

DevanagariHindipublished315 पृष्ठ

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२४७ है। रचना काल १०७३ लिखा हुआ है। प्रति सं० १८२६ बीकानेर में 'रतनसी' लिखित है। [ १५ ] नाम—बीसलदे रास। कागज—देशी (हाथ [ गुप्त : प० का बना हुआ)। पत्रे—पचीस। दोनों तरफ लिखे हुए समूह नं० ७, आकार—९ ३/८ इं० X ५ ३/८ इं०। पक्तियों—दस से १३ संकेत "पु०" ] पक्तियाँ प्रत्येक पृष्ठ पर । छंद संख्या—२३९ । प्रकार— पुराना फटा हुआ, पूर्ण । अक्षर—देवनागरी । सुरक्षित स्थान—अभय जैन भण्डार ( बीकानेर ) । पुष्पिका—नहीं है। आदि अन्त तथा बीच के कई पत्र दूसरे व्यक्ति के लिखे जान पड़ते हैं । प्रारम्भ—गणेशायनमः । गवरिका नन्दन त्रिभुवन सार । नाद भेदइ थारइ उदर भण्डार । एक दसत मुषिक झलहलइ । मुषका वाहण तिलक सिंदूर । कर जोडी नरपति भणई । जाणि करि रोहिणी ज्यूं तप्पत सूर ॥ अंत—कनक काया जैसी कूं कूं रोझ । कठिन पयोधर हेम कथोळ । देखि गरम सी कूंऊली । घालण ड्युं घण मोडइ नाक । कटि मोडइ घालइ गोरडी । उसुकी विरह वेवना ना लहइ कोइ । जिउ राजा रांणी मिळ्या । स्युं नावढ कहइ मिळिज्यो सहु कोइ ॥ रचना-तिथि—संवत् सहस सतिहत्तरह जांणि । नाषद कविसर सरसीय वांणि । गुण गुब्या चउहाणा का । सुबुद्ध पक्ष पचमी धावण मास । रोहिणी नषित्र सोहामयो सुदिन गिण जोईसी जोडियउ रास । प्रं०—यह प्रति स० १७२७ वाली प्रति से मिलती- जुलती है। [ १६ ] नाम—बीसलदे रास। कागज—देशी (हाथ [ गुप्त : प० का बना हुआ) पत्रे—आठ । एक पत्र भी माइटा जी समूह न० ४, द्वारा जोडा हुआ । आकार—६ ३/४ इं० X ४ ३/८ इं० । संकेत "आ०" ] पंक्तियों—बीस पक्तियाँ प्रत्येक पृष्ठ पर छंद् । सख्या—२४७ ।