बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)
Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans
नरपति नाल्ह द्वारा
DevanagariHindipublished315 पृष्ठ
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- ७४ - गँ तठ¹ उहर² पोखिण्ड फेरियउ नाहु³ । तिणि युत्तबनद्र सरी पण दुछी ॥ दाछीयठ⁴ पामउ⁵ थूकठ⁶ शड ॥ आगद्द⁷ प्रिय की वहूरणि⁸ मदीय पनास⁹ । तत्र सायपण¹⁰ धरि मण्डइ¹¹ शाम ॥ १. आ० १२ तइतउ । २. आ० १२ अररकर । ३. आ० १२ राउ । ४. आ० १२ ढालीयौ । ५. आ० १२ पासी । ६. आ० १२ थूँचूकी । यह छन्द अ० २ खण्ड में २०, आ० ६ खण्ड २ में १६, आ० ६ में १०४, आ० १२ में ६२ है । लेकिन अ० २ और आ० ६ में पंक्तियों का क्रम इस भाँति है— १ पंक्ति-इस छंद की ५वीं पंक्ति । २ पंक्ति-अछीय चरित्र नवि लहहे विचार (उलपइ गँवार अ० २) । ३ पंक्ति-इस छन्द की ३री पंक्ति । ४ पंक्ति-इस छन्द की २री पंक्ति । ५ पंक्ति-तउ (तोहि आ० ६) यती नो म्हारो बाल हो । ६ पंक्ति-निहचै करि मोझगे चालणहार । आ० १२ में ४थी और पाँचवीं पंक्ति है— ४. मूरप राव न आणै सार । ५. राव बडो पणि भइसि फोदार । ७. आ० १२ आगे । ८. आ० ६ बरयणि, आ० १२ कू वैरणि । ९. आ० १२ निवास । १०. आ० १२ सापण ("तत्र" नहीं है) । ११. आ० १२ माहि मांडीप ।