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बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans

नरपति नाल्ह द्वारा

DevanagariHindipublished315 पृष्ठ

पृष्ठ 183, कुल 315 में से

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पृष्ठ 183

दात$^१$ सूकट$^२$ पड्या$^३$ दावडी । भोली$^४$ तो$^५$ थी$^६$ भली <u>दवदती</u> हे नारि ॥ सोइ$^७$ नल$^८$ राड$^९$ छोड़ी गयो$^{१०}$ । पुरष सउ$^{११}$ नीच$^{१२}$ नहीं संसारि$^{१३}$ ॥ धे भली सराहा <u>द.दन्ती</u> हे नारि । बारह बरस नल कीन सभजइ$^{१४}$ ॥ जे चित आयइ सामरि धखो । जायाउ जे अपदछु$^{१५}$ करउ$^{१६}$ ॥ राउराउ घरणी$^{१७}$ माथा छइ नइ$^{१८}$ विडार ॥


१+२+३ अ० २ दात कए वैद्यो अ० ६ दर सकट आँध्या, आ० १२ दत सूकट पड्या । ४ अ० २, आ० ६ ( में नहीं है ), आ० १२ ( में नहीं है ) । ५+६. अ० २ तो थी भली हुती, आ० १२ तो थी । ७+८ अ० २ नल, आ० ६ जो नल । ९ आ० ६ मेल्ही, आ० १२ राय । १० अ० २ मेल्हे गयो आ० ६ बन गयो । ११ आ० ६ इसो, आ० १२ समो । १२ अ० २ निगुण, आ० ६ नगुण, आ० १२ ( में नहीं है ) । १३. आ० १२ कठिन ससार । यह छंद अ० २ खण्ड ३ में २, आ० ६ खड में ३ में ३, आ० ६ में १०८, आ० १२ में ६६ है । लेकिन आ० ६ में २री पक्ति है — आन न पावि नैतरि नाह । १४ आ० ६ समाल । १५+१६ आ० ६ आपदच करू । १७ आ० ६ घरतीय । १८ आ० ६ से । यह छंद आ० ६ में १०९ है । लेकिन आ० ६ में छूटी हुई ४था पक्ति भी है— दिय, इटले दुप न सह्योनार ।

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