बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)
Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans
नरपति नाल्ह द्वारा
DevanagariHindipublished315 पृष्ठ
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- ८६ - चारगढ१ उजतायउ२ कातिग मास। छोड्या३ मंदिर घरि४ क विलास॥ छोट्या५ चउरा६ पडपडी। गढह दंधिरि नयण गमाह्या रोइ७ ॥ भूख गई८ त्रिप९ उछटी१० । कदि११ सगी१२ नीद किसी परि१३ दीह ॥ मग सिरोय१४ दिन घंटा रे१५ दोइ। सपीय सदेस न पाठवइ१६ कोइ॥ १. अ० १ चालीयो, आ० १२ चाल्यो। २. अ० २, आ० ६आय तो, आ० १२ उलिगाणी। ३. अ० २, आ० ६ सूना। ४. आ० १२ गिरि। ५. अ० २, आ० ६ सूना, आ० ६ नउढ्या। ६. आ० ६ चोरा, आ० १२ चौबारा। ७. अ० २ बाई, आ० ६ जोय। ८. अ० २, आ० ६ नही। ६. आ० ६ तइ। १०. अ० २ ऊछन्नी, आ० ६ सो छुट्टी, आ० ६ अउचटी। ११+१२ अ० २ उणी घडी, आ० ६ तिस घटी। १३. अ० २, आ० ६ नीद कहाँ थी। यह छंद अ० २ खड ३ में ८, आ० ६ खड ३ में ७, आ० ६ में १२२, आ० १२ में ११० है। इस छंद की अंतिम दो पंक्तियाँ आ० १२ में नहीं हैं। १४. अ० २ आघणकर, आ० ६ आगैं तो, आ० १२ मगसिरिये। १५. आ० ६ छोटडी। १६. अ० २ मोकलोऊ, आ० ६ मोकल्यो, आ० ६ पाठव्यो, आ० १२ सदेसा हीन पठायै।