बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)
Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans
नरपति नाल्ह द्वारा
DevanagariHindipublished315 पृष्ठ
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७ - ६७ - वनिन¹ सिरजी कोइली ।- इठ² वइसंती³ आवागई⁴ रुपाकी डाल ॥ भपती ' दाय विनोवंडी । सहू सउ काइ⁵ तिरजी उसगाणा की नारि ॥१३४॥ आगयो काइ न सिरजो करतार । चेत कमावती स्यूं⁶ भरवारं⁷ ॥ पहिरण आछी छीवंडी । तुंग तुरंग⁸ जिम मोडती गात्र ॥ १ साहू लेती सामुही । इसि इसि घूझति पोइ⁹ की बात ॥१३५॥
१. आ० १२ वनदन । २. आ० १२ यू । ३. आ० १२ वैसती । ४. आ० १२ आवाने । ५. आ० १२ तोकिउ । ' यह छंद अ० २ राट ३ में ४, आ० ६ सा० ३ में ५, आ० ६ में नहीं है, आ० १२ में १०३ है । ६ + ७ अ० २ जाट स्यु, आ० १२ स्यु भरवार । ८. आ० १२ तुरिय । ९. आ० १२ पीठ । यह छंद अ० २ राट २ में १२१२ है, आ० ६, आ० ६ में नहीं है । आ० १२ में १२४ है । अ० २ में ये सात पंक्तियां हैं -१. भूली है अरहनट्टी इवै बीसास । २. हूँ नीर आणू चीतवि जास ॥ ३ वरमंती दाय रंगावती व्याह । ४. अंकन कुछार रहती रुपी ॥ ५ ओढण लेणटी आरती भल । ६ यह पंक्ति उपर्युक्त छंद की २री पंक्ति है। ७. मइं काइ सिरजी उलिगाणा परि नारि ।