बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)
Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans
नरपति नाल्ह द्वारा
DevanagariHindipublished315 पृष्ठ
पृष्ठ 207, कुल 315 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 207
- १०१ - धावन्न छायह¹ घड जे² । उच्छिठ गाल उपाइअ खिल्लक सत्तूर ॥१४०॥ पडासू कठद्दे पहु घरि माहे³ आइ⁴ । चदरद्⁵ भोहइ गिलेसी राह ॥ थन्र पुलिंदा⁶ यनि⁷ गपठ । दूब किम हयरह यथारि कह परि ॥ उलगाराण की गोरठो । थारउ नाउँ⁸ उडीलइ घण⁹ गढ़ धम्मैर ॥१४१॥ १ आ० ६ छायौ । २. आ० २, आ० ६ चद्रमा । यह छंद अ० २ खंड ३ में ५३, आ० ६ पाठ ३ में ५० है । आ० ६ आ० १२ म नहीं दै । लेकिन इसकी यातम पंक्ति अ० २ और आ० ६ में है— “श्रीकी गात (आ० ६ उवाका) उघाड्या ( आ० ६ घर माहे ) जावनजूर ।” ३ आ० ६ भीतर । ४. अ० २ आव आ० १२ आव । ५. आ० ६ चांद कह, आ० १२ चद कै । ६ + ७ आ० ६ फूलतो बनी, आ० १२ पुलिहा दनि । ८ अ० २ राव, आ० ६ राय । ९. अ० २ तु, आ० ६ मैनू यह छंद अ० २ खंड ३ म ७४, आ० ६ रांड ३ में २२, अ० १२ में २८ है। लेकिन अ० २ और आ० ६ म चौथी और पाँचवों पंक्तियाँ हैं— ४ खीर (सना आ० ६) को तोलही (पकूडी आ०६) कु (किहा--आ० ६) रहद संर । ५ घणी थाका घण ताफनइ । आ० १२ म चौथी पक्ति है - “दूब न छुटे मजारह फटि ।”