बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)
Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans
नरपति नाल्ह द्वारा
DevanagariHindipublished315 पृष्ठ
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- १२३ - पुयय¹ राजा मोनद्द ऊअगद्द । हिव तेद नठ गुरु देहि² परिमाण्ण ॥ गढ़ अजमेर³ कयउ धणी । मंत्रि ग्यारह युग⁴ चीसठ चतुआण ॥१७५॥ दीया ढकारा नगर मझारि । घरि घरि राउ फिरइ⁵ पटदार⁶ ॥ नगरि लुढाई संघरी । सवे ठाकुर⁷ घरि वागे रक्षा ॥ राउ आप आहेडइ मिसि चढइ⁸ । सिंह सिकार मह पेल्लणजाइ ॥१७६॥ फिरिया न की⁹ फेरापई भांणि । घरि घरि सज्या एह तृणीय फेडाणि ॥ १. आ० ११ पुण । २. आ० १२ तेह नठ गुरुत्यो । ३. आ० १२ अजमेरह । ४ आ० ६ मंत्री चउरा ग्यारै, आ० १२ मत्री कीश म्हारै । यह छंद आ० ६ में १७७ तथा आ० १२ में १६० है । ५. आ० १२ रावली फिरै । ६. आ० ६ पटधार, आ० १२ पहदार । ७. आ० ६ परिरख्या हो राइ । ८. आ० ६ आप आहेडा मिस चडे, आ० १२ आहेटा मिसि चढै । यह छंद आ० ६ में १७८ तथा आ० १२ में १६१ है । लेकिन आ० २ में ४थी तथा पंक्तियों हैं :— ४. "सवे ठकुराला सपरिवार हाँ । ५. लसकर ने नेलावण जाइ ।" ९. आ० ६ नकाय, आ० १२ स्वामी कीइव ।