बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)
Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans
नरपति नाल्ह द्वारा
DevanagariHindipublished315 पृष्ठ
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- १२१ - म्हा¹ गुहेह² सप्पउ ³ राउ जी । हियद घापा⁴ उगाहौँ⁵ हो धरह नेस ॥१६१॥ तब इसि बोलउ राउ⁶ बहुभाय । तुम्हारउ⁷ बचन सामी⁸ परभाण ॥ बीनती एक⁹ म्हाकी सुणउ । म्हे सउ साझता गोरौय¹⁰दीन्ही धी¹¹माँह ॥ वरस बारह पछइ आविहौँ । दिय तुम्हि¹² कहउ¹³ जिम घरि¹⁴ जोह ॥१६२॥ तब¹⁵ पडउ थरु कोरपा परधान । पूरखउत राउ दीय¹⁶ बहु मान ॥ १+२+३ आ० ६ म्हे तुम्हा सप्यो । ४+५ आ० ६ आप उम्हाहउ । यह छंद आ० ६ में १६३ तथा आ० १२ में १७६ है । लेकिन १२ में ५वीं पंक्ति है - "म्हे थाने राज सुपीयौ ।" तथा ६ठी पंक्ति है - "आप उगाढो धण नरेस ।" ६. आ० १२ राय । ७. आ० १२ थारौ । ८. आ० १२ स्वामी । ९. आ० १२ एक । १०. आ० १२ गोरी ने । ११ आ० १२ छै । १२ आ० १२ ( में नहीं है ) । १३ आ० ६ दिये तुम्हे कहौ । १४. आ० १२ में 'जिम' और 'घरि' के बीच में "हमि" है । यह छंद आ० ६ में १६४ तथा आ० १२ में १७७ है । १५. आ० १२ ( में नहीं है ) । १६ आ० १२ पुरखौ राइ दीयौ ।