बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)
Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans
नरपति नाल्ह द्वारा
DevanagariHindipublished315 पृष्ठ
पृष्ठ 241, कुल 315 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 241
- १३५ - साठि भरड सुग्दे सठ प्यारि । भरिज्यो¹ अरथ दरब² भंडार ॥ भिजियो हीरा पाथरी । पुरिव्वियड वोल्लड बोलि बिचारि³ ॥ यहउ हमरठ जे सुणउ । खड सुग्दे पालिग्यो पुतिवारि⁴ ॥१४८॥ तब भीतरि संचरिया ढूढंमंउ⁵ राउ । भानमती गण्णे लीयउ⁶ बोलाइ⁷ ॥ १. आ० ६ भरो थे । २. आ० १२ गरब । ३. आ० १२ पूरण्यो, बोलविचार । ४. आ० १२ एतीयथार । यह छन्द अ० २ खड ३ में ६१, आ० ६ खंड ३ में ५८, ५६, आ० ६ में ०० तथा आ० १२ में १८३ है । किन्तु अ० २ और आ० ६ मे इसका पाठ इस प्रकार है— "कोक पाल्थी अरी परधान । दीधा छे जन बिह्य चउगुणउ मान ॥ चौको चामर धसतगद । नव गज ऊँचा हाथी च्यार ॥ आग्या ले अरथ के दरब भंडार । आग्या हीरा पाथरी । दधा ताजी मात गयंद ॥ कधाइ पहराइ नव-रा १ । चाल्यो राजा मास बसन्त ॥" आ० १२ में १ली पंक्ति है :— "साठढी रिज्यो सह सविचार ।" ५. अ० २ दोई, आ० ६ दुहै, आ० ६ दोनू, आ० १२ दोनूं । ६. अ० २ लीय, आ० ६ लीया, आ० १२ लीयो । ७. अ० २ बोलाई, आ० ६ बोलाय ।