भारतकोश
बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans

नरपति नाल्ह द्वारा

DevanagariHindipublished315 पृष्ठ

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  • २४६ - आपि डमरू माहि सचरा¹। ग्हे तउ अण विधि ²राव साधी³ परदेश ॥२१३॥ ये तठ पाछठ हो⁴ जोगी मुलावइ वार । सतपिया जाइ जयविज्यौ⁵ सार ॥ राजावती राणी नई इम⁶ कहे । नारी घर नई उमाहियह पीसतराउ ॥ तुरंग पछाण्या⁷ छह काढ़िटा⁸ । दिन विहु गाहि मिले सोय⁹ आइ¹⁰ ॥२१४॥ तवह् सागिनठ चाखिउ छह¹¹ मुदिक्खठ पह। सींगी नाद पूरठ¹² सिध ठाह ॥ गुरू का वचन स्मरण करूया¹³ । उठु तउ¹⁴ धरती भूलि न देईय¹⁵ पाठ ॥ १. आ० १२ सचरू । २ आ० ६ ग्हे इणविधि, आ० १२ इणिविधि । ३ आ० ६ राय साधा, आ० १२ साधाराव । यह छंद आ० ६ में २१५ है तथा आ० १२ में २०८ है । ४. आ० १२ (में नहीं है)। ५ आ० १२ भायोज्यो । ६ आ० १२ इम । ७. आ० १२ पळाणीय । ८ आ० ६ काढिजा, आ० १२ पायरूया । ९+१० आ० ६ तुम्हा मिलिस्यह राह, आ० १२ मिलसी आइ । यह छंद आ० ६ में २१६ तथा आ० १२ में २०६ है । ११. आ० १२ (में नहीं है)। १२ आ० १२ सागानाद पूरइ । १३ आ० १२ समरभया । १४. आ० १२ उठनौ । १५ आ० १२ मूलन देयह ।