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बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans

नरपति नाल्ह द्वारा

DevanagariHindipublished315 पृष्ठ

पृष्ठ 300, कुल 315 में से

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पृष्ठ 300
  • १६७ - के राजपूताने में बसने के बाद इनका मिश्रण राजपूताने के अन्य जातियों के साथ हुआ हो और तब से इनके गोत्रों का अन्य अन्य जातियों में पाया जाना सम्भव हुआ हो। भाटों का कथन इसी आधार पर स्थित ज्ञात होता है। आज भी मारवाड़ के पूर्वी परगनों तथा 'पर्वतसर' आदि स्थानों में यह जाति पर्याप्त संख्या में विद्यमान है। यह जाति अपना घर बस्ती से दूर बनाती है क्योकि ऐसा करने में इन्हें अपने व्यवसाय पशु-पालन में सुविधा होती है। कहावत प्रसिद्ध है, 'गूजर जहाँ ऊजड़'। ये छप्पर छाने के कार्य में पटु होते हैं और विशेषकर इस जाति की स्त्रियाँ इस कार्य को करती हैं। उन्हे अपने इस कार्य की दक्षता का अभिमान भी है। ये लोग 'गूजरे डेरीमाता', देवजी¹ तथा 'भैरोजी' की उपासना करते हैं तथा अपने देवताओं के सम्मान में गले में फूल पहनते हैं। ये मास और मदिरा के सेवन के अभ्यस्त हैं। इनके यहाँ मृतक के शव की हजामत बना कर उसकी दाह क्रिया की जाती है और मृतक का श्राद्ध दीपावली पर करने की इनकी परम्परा है। 'कछवाहा' कछवाहा जाति के राजपूत अपने वंश की उत्पत्ति महाराज रामचन्द्र जी के द्वितीय पुत्र 'कुश' से मानते हैं। ऐसा कहा जाता है कि यह जाति अयोध्या से स्थानान्तरित होकर 'नरवर' आयी और वहाँ से रोहतास और 'रोहतास' से 'आमेर' आयी। यहाँ आकर यह जाति बस गयी। अभी भी आमेर में इनकी तीन मुख्य शाखाएँ मिलती हैं :-१. शेखावत, २. नरूका तथा ३. राजावत। १—शेखावत शेखा जी के वंशज हैं। कहा जाता है कि शेख बुरहान नामक किसी मुसलमान फकीर की कृपा से शेखा को जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम मोकल जी था। अतः, इनसे चलने वाली शाखा का नाम शेखा- वत पड़ा। शेखावत अपनी सन्तानों को छह वर्ष की अवस्था तक नीले रंग की टोपी और पायजामा पहनाते हैं। ये लोग सूअर के मांस का भक्षण नहीं करते। २—नरूका अलवर राज्य का शासक वंश है। १. नोट—लगभग ६५० वर्ष पूर्व मेवाड़ में 'देवजी' नाम के एक महात्मा हुए थे। उन्होंने मेवाड़ में अनेक करामातें दिखाई थीं। गूजर इन्हीं 'देवजी' के भक्त हैं।
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