बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)
Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans
नरपति नाल्ह द्वारा
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किसानी है । कहीं-कहीं पंवारों में लोग शव को उलटा रख कर शवदाह करते हैं । इनके पूर्व वैभव का एक सोरठा प्रसिद्ध है:— पृथ्वो बडा पयार, पृथ्वी पंवारातणी । एक उजेणी धार, दूजो आवू नैठणूं ॥ चौहान पंवार की तरह चोहान भी उन चार अग्निकुल वंशीय राजपूतों में से एक है, जिनकी उत्पत्ति आवू पर्वत पर किये गये यज्ञ के अग्निकुण्ड से मानी जाती है । कर्नल टाड के मतानुसार राजपूत जाति की समस्त शाखाओं में से ये वीरता में सर्वश्रेष्ठ हैं । पंवर वंश के पश्चात् कुछ काल तक दिल्ली पर इन्हीं का शासन रहा । मारवाड में भी अनेक स्थानों पर इनका अधिकार था और ये उन स्थानों के शासक रह चुके हैं । बीसलदेव रासो के अध्ययन से पता चलता है कि ११ वीं शताब्दी में अजमेर के शासक चोहान वंशीय राजा ही थे । आज भी मारवाड के विभिन्न भागो में ये अपनी वीरता की सेवाओं के उपलक्ष्य में प्राप्त भूभाग को लिये हुए बसे हुए हैं । चौहान वंश से जिन शाखाओं का विकास हुआ है, उनमें मुख्य और महत्व- पूर्ण 'देवडा', 'हाडा', 'सोनगरा', 'निवाणपुर्विया' और 'सांचोरा' हैं । इन विभिन्न शाखाओं के अतिरिक्त एक शाखा मुसलमान चौहाना की भी है, जो सन् १३८३ ई० में फिरोजशाह तुगलक के शासन काल में मुसलमान हो गये थे । इस शाखा के चोहान 'कायमखानी' नाम से प्रसिद्ध हैं । चौहान वंश की कुलदेवी शाकंभरी माता हैं । इस वंश के राजपूतों में 'गोगा जी' का नाम बहुत प्रसिद्ध है । ये लोग उनके नाम का एक धागा धारण करते हैं और विश्वास करते हैं कि यह धागा साँप के काटे व्यक्ति को स्वस्थ करने में समर्थ है । भाद्र सुदी ६ को ये लोग 'गागानवमी' नामक उत्सव मनाते हैं । ये गोगाजी कान थे कहा नहीं जा सकता । लेकिन इनकी मान्यता और प्रसिद्धि को देखते हुए ज्ञात होता है कि ये अवश्य कोई सिद्ध पुरुष, इनके वंश में हुए होंगे । 'कायमखानी' भी गोगा जी को गोगापीर के नाम से पूजते हैं । पश्चिमी प्रान्तो के निवासी चौहानों में उत्तराधिकार में प्राप्त सम्पत्ति को पुत्रों एव विधवा स्त्रियो में बाँटने की प्रथा है । इसी वंश ने सर्व प्रथम 'नाता प्रथा' का प्रचलन किया और 'नातरायत' के नाम से नवीन समुदाय की नींव डाली । जालोर के राजा कानडदेव ही वे प्रथम राजा थे, जिन्होने अपनी विधवा पुत्री का पुनर्विवाह चित्तौड के राणा के साथ कर 'नाता प्रथा' को आरम्भ किया था ।