बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)
Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans
नरपति नाल्ह द्वारा
DevanagariHindipublished315 पृष्ठ
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- १२ - होगा । अस्तु, इसकी भाषा भी संवत् १२६१ से पहले की है, इसमें सन्देह नहीं । बीसलदेव रासो की भाषा जैसा कि ऊपर उदाहरणों द्वारा दर्शाया गया है "अपभ्रंश व्याकरण" और "प्रबन्ध चिन्तामणि" में उद्धृत उदाहरणों की भाषा से बहुत अंशों में मिलती जुलती है । भाषा के उपर्युक्त आधार पर निर्भर होकर ऐसा कहा जा सकता है कि बीसलदेव की रचना ग्यारहवीं शताब्दी के उत्त- रार्द्ध और १२ वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में हुई होगी। लेकिन भाषा के आधार पर उपर्युक्त निर्णय करने में डा० उदयनारायण जी तिवारी द्वारा निकाला गया यह निष्कर्ष कि चूँकि नाल्ह न तो भाषा का पण्डित था और न कोई सुकवि, अतएव उसने अपनी मातृ भाषा राजस्थानी में बीसलदेव रासो की रचना की, बाधा उपस्थित करता है, यद्यपि डा० तिवारी का यहाँ "राजस्थानी" कहना अस्पष्ट है, क्योंकि इसके द्वारा उनका संकेत किस ओर है, इसका ठीक ठीक पता नहीं चलता । यदि डा० तिवारी का उद्देश्य 'राजस्थानी' से शौरसेनी अपभ्रंश से हो, तब तो उपर्युक्त निकाले गये निष्कर्ष से उनका मन्तव्य सिद्ध होता है, और यदि उनका अर्थ राजस्थानी से पूर्वी और पश्चिमी राजस्थान की बोलियों से है तब यह विचार करना होगा कि ये बोलियाँ कब से राजस्थान में प्रचलित हुईं । इन बोलियों के सम्बन्ध में डा० सुनीतिकुमार जी चाटुर्ज्या का कहना है कि पुरानी पश्चिमी राजस्थानी साहित्य 'अर्थात् पुरानी मारवाड़ी, गुजराती साहित्य' का इतिहास ई० चौदहवीं सदी के द्वितीयार्द्ध से शुरू हुआ, मारवाड़ और गुजरात में प्रचलित मौखिक अपभ्रंश से, 'जो शौरसेनी से निकट सम्बद्ध होती हुई भी उसे स्वतन्त्र अपभ्रंश थी ऐसा अनुमित होता है-इसे हम "सौराष्ट्र अपभ्रंश" कह सकते हैं । पुरानी पश्चिमी राजस्थानी का उद्भव, तेस्सीतोरी के मतानुसार, ईस्वी तेरहवीं शती में हुआ था । गुजरात और मारवाड़ के जैन आचार्य और पण्डितों के द्वारा सौराष्ट्र अपभ्रंश से उद्भूत पुरानी राजस्थानी में साहित्य सर्जना होने लगी, पर साथ ही साथ शौरसेनी अपभ्रंश साहित्यिक भाषा में पूर्ववत् काव्यादि साहित्यिक रचना की नीति अन्वाहित रही । फिर, यह शौर- सेनी अपभ्रंश साहित्यिक भाषा, पूर्व से बढ़ती गयी, इसका एक नवीन या अर्वाचीन रूप, पिंगल नाम से, राजस्थान और मालव के कवियों में पूर्णतया गृहीत हुई, पिंगल का एक साहित्य बन गया। फिर राजपूताने के भाट और चारणों ने पिंगल की अनुकारी एक नई कवि भाषा मारवाड़ी के आधार पर बनाई, जो "डांगल" या 'डिंगल' नाम से अब परिचित है। डिंगल काव्य ईस्वी पन्द्रहवीं शती से उपलब्ध है। ज्यादातर इसकी शब्दावली साहित्यिक थी,