बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)
Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans
नरपति नाल्ह द्वारा
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करता मिलता है। परन्तु वास्तव में यह विग्रहराज या बीसलदेव सं० १०३० वि० में राज करता था।^1 बाबू श्यामसुन्दरदास जी ने अनन्द सम्वत् संवत् की कल्पना के सहारे से पृथ्वीराज रासो में दिये हुए सं० में इस बीसलदेव का समय मिलाने का यत्न किया है^2 इस बीसलदेव का मालवे परमार राजा भोजदेव का तो नहीं किन्तु उसके पिता सिन्धुराज का समकालीन होना सम्भव है, क्योंकि भोजदेव सं० १०८० वि० में कुछ पहिले गद्दी पर बैठा था और सं० १११५ या १११६ के लगभग मृत्यु को प्राप्त हुआ या मारा गया। बीसलदेव भोज से पहले मर चुका हो क्योंकि पृथ्वीराज विजय नाम की पुस्तक और शिला लेखों में दी हुई चौहानों की वंशावली के अनुसार सिंहराज के विग्रहराज या बीसलदेव, दुर्लभराज, चन्द्र- राज और गोविन्दराज नाम के पुत्र थे। वास्तव के पीछे दुर्लभ और उसका भाई गोविन्दराज राजा हुआ। गोविन्दराज के पीछे वाक्पतिराज दूसरा और फिर उसके छोटे भाई वीर्यराम की बारी आई। यह वीर्यराम अवन्ती के राजा भोज के हाथ से मारा गया था। वीर्यराम का उत्तराधिकारी दुर्लभराज तीसरा मालवे के राजा उदयादित्य का, 'जिसके लिये लेखों में भोजदेव का सम्बन्धी होना लिखा के हैं,' समकालीन था, जिसने स० ११५१ वि० के निकट तक राज किया। तीसरा विग्रहराज या बीसलदेव दुर्लभराज तीसरे का भाई था जिसका राज सं० ११५१७२ वि० के बीच में होना चाहिए। इसके लिए बिजोल्यां की प्रशस्ति में लिखी है कि धी चण्डी रनिषेति शण सुचर धी सिंहटो घूम्रखस्तद् भ्राता यत सोपि वीसल नृपः धी राजदेवी प्रियः । अर्थात् यही वीसलराज राजमती का पति था। परन्तु यह नहीं कह सकते कि राजदेवी मालवे के राजा भोजदेव ही की कन्या थी। चौथा विग्रहराज या बीसलदेव बिजोल्यां की प्रशस्ति' में इसका नाम वीसल दिया है। 'अर्णोराज' 'आनल्ल देव' का पुत्र और सोमेश्वर का बड़ा भाई था
1 Epigraphia Indica vol II P 119 हर्षनाथ के मंदिर का शीला- घटी प्रान्त में लेख। २ — अनन्द सम्वत् संवत् की कल्पना मोहनलालजी विष्णुलालजी पंड्या ने की है लेकिन कोई प्रमाण नहीं मिलता। कहीं ६० और कहीं ९१ वर्ष पृथ्वी- राज रासो में दिये हुए संवतों को शुद्ध ठहराने के लिए मिलाए हैं। लेकिन इतने पर भी पृथ्वीराज के सब संवत् ठीक नहीं मिलते।