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बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans

नरपति नाल्ह द्वारा

DevanagariHindipublished315 पृष्ठ

पृष्ठ 55, कुल 315 में से

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पृष्ठ 55
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उपर्युक्त प्रमाणों से यह निश्चय तो हो गया कि परमार और चौहान वंश का आपस का सम्बन्ध था तथा यह भी निश्चय हो गया कि राजा भोज के समकालीन इन तीन बीसलदेवों में से कोई नहीं था। लेकिन जहाँ कवि ने बीसल- देव रासो में यह नहीं लिखा कि बीसलदेव से उसका अर्थ किस बीसलदेव से है, वहीं उसने यह लिखा है कि राजा भोज की पुत्री राजमती से बीसलदेव का विवाह हुआ था जिससे समझने में दुविधा हो जाती है कि कवि किस बीसलदेव की ओर संकेत कर रहा है। बिजोलियाँ के शिलालेख से, जिसका उल्लेख ऊपर किया जा चुका है यह बात प्रमाणित होती है कि बीसलदेव तृतीय की रानी का नाम राजदेवी था। बीसलदेव रासो की राजा भोज की पुत्री राजमती और यह राजदेवी एक ही रानी के सूचक होने चाहिए। १ लेकिन चूँकि ऊपर यह प्रमाणित किया जा चुका है कि बीसलदेव तृतीय, राजा भोज का समकालीन नहीं था, वरन् राजा भोज के अंतिम समयों में राजा हुआ जिससे यह सिद्ध होता है कि सम्भवतः राजा भोज के भाई उदयादित्य ने, जिसका समय इतिहासकारों ने सं० १११६ से ११४३ वि० सं० १ माना है और जो बीसलदेव तृतीय का समकालीन था २, भोज की पुत्री का विवाह बीसलदेव तृतीय से किया हो। जयानक कृत "पृथ्वीराज विजय काव्य" तथा इतिहास में इसका उल्लेख मिलता है कि वीर्यराम, जिसका उल्लेख बिजोलियाँ के शिलालेख में सिंहट के नाम से हुआ है, विग्रहराज तृतीय का पिता था और इसे अवन्ती के राजा भोज १-न० प्र० पत्रिका—सं० १६६७, पृ० १६८। २—ग्वालियर में उदयपुर का शिलालेख :—इस लेख में उदयादित्य का राज्य काल वि० सं० १११६ तथा शक सं० ६८१ (ई० सन् १०५६-६०) दिया हुआ है तथा यह भी लिखा है उसने शंकर का मंदिर निर्माण करवाया। दे०-कैप्टन नर्ट का होल जे० एन० बी० पोल्यूम ७ पृष्ठ १०५६ उदयपुर मन्दिर का शिलालेख :— यह लेख ग्वालियर के उदयपुर के मंदिर के पूर्वीय दरवाजे के भीतर सुन्दर रूप में सुरक्षित है। इसमें छः पंक्तियाँ हैं और उसमें उदयादित्य का नाम दिया हुआ है तथा तिथि वि० सं० ११३७ दी हुई है। यह लेख सम्भवतः पं० महीपाल रचित है।

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