बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)
Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans
नरपति नाल्ह द्वारा
पृष्ठ 72, कुल 315 में से
संदर्भ में पढ़ें५ — ६५ — बीसलदेव रासो का रचयिता बीसलदेव रासो के रचना काल की गुत्थी को सुलझाना जितना जटिल है उससे कम जटिल उसके प्रणेता के प्रादुर्भाव काल नाम और जाति की गुत्थी का सुलझाना नहीं । बीसलदेव रासो की यद्यपि अनेक हस्तलिखित प्रतियाँ प्राप्य हैं लेकिन उनमें से किसी भी प्रति में कवि के प्रादुर्भाव-काल का ऐसा संकेत नहीं मिलता जिसके आधार पर निश्चित रूप से कहा जा सके कि कवि का जन्म अमुक तिथि को हुआ था । इन हस्तलिखित प्रतियों में ग्रन्थ का रचना-काल } अवश्य दिया हुआ है जिसके आधार पर कहा जा सकता है कि ग्रन्थों के रचयिता ने भी उसी काल में जन्म ग्रहण किया होगा; लेकिन इस बात को स्वीकार करने में सबसे बड़ी समस्या हस्तलिखित प्रतियों में प्राप्त रचना-काल की वे विधियाँ हैं जो विभिन्न प्रतियों में विभिन्न रूपों में पायी जाती है । समस्त हस्तलिखित प्रतियों में प्राप्त रचना विधि के आधार पर मुख्यतः प्रतियों के दो विभिन्न भाग किये जा सकते हैं—प्रथम भाग में वे सभी प्रतियाँ आ जायेंगी जिनमें रचना-काल का उल्लेख ११वीं शती है, और दूसरे भाग में अन्य वे सभी प्रतियाँ आयेंगी जिनका रचना-काल १३वीं शती ठहरता है । जिसका उल्लेख ऊपर किया जा चुका है । अस्तु ऐसी परिस्थिति में कवि का जन्म काल ११वीं और १३वीं शती दोनों मानना पड़ेगा, जिसे स्वीकार करना सम्भव नहीं । तब यदि रचना- तिथि का निर्णय कर लिया जाय तो कवि के जन्म काल का भी निर्णय करना सहज हो जायगा । रचना-तिथि का निर्णय ग्रन्थ में प्राप्त ऐतिहासिक तत्त्वों और भाषा के आधार पर किया गया है, तथा इस निष्कर्ष पर पहुँचा गया है कि इसकी भाषा ११००-१२०० वि० सं० की है और इसका नायक बीसलदेव तृतीय है । लेकिन इस निष्कर्ष पर पहुँच कर भी कवि के जन्म तिथि की समस्या ज्यों की त्यों रह जाती है क्योंकि गणना के अनुसार हस्तलिखित प्रतियों में प्राप्त रचना-तिथियों में से सर्वाधिक प्रामाणिक तिथि वि० सं० १२१२ ठहरती है । इसी समस्या को सुलझाने के लिए सम्भवतः श्री सत्य जीवन जी वर्मा ने ग्रन्थकार को बीसलदेव चतुर्थ विग्रहराज चतुर्थ का, जिनका समय वि० सं० १२१०-१२२० माना जाता है, समकालीन माना है । प्रकट किये गये अपने इस मत के प्रमाण में श्री वर्मा जी ने दो तर्क उपस्थित किये हैं—पहला तो ग्रन्थ में प्रायः सर्वत्र वर्तमानकालिक क्रिया का प्रयोग किया जाना और दूसरा रचना-तिथि के सम्बन्ध में आयी