भारतकोश
बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans

नरपति नाल्ह द्वारा

DevanagariHindipublished315 पृष्ठ

पृष्ठ 74, कुल 315 में से

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  • ६७ - नामक कवि था। लेकिन इस नाम के सम्बन्ध में भी डॉ० उदयनारायणजी तिवारी तथा श्री सत्यजीवन जी वर्मा जैसे विद्वानों का मत है कि नरपति कवि का मुख्य नाम तथा नाल्ह कौटुम्बिक नाम प्रतीत होता है।¹ इसी प्रकार रासो की निम्न दो पंक्तियों को उद्धृत कर यह प्रश्न उठाया जा सकता है कि नरपति और नाल्ह दो विभिन्न व्यक्ति थे और नरपति द्वारा गाई गई इस रासो को नाल्ह ने फिर से गाया। कर जोडि नरपति कहई । नाल्ह कहई जिण आवई रोड़ि ॥ कवि के नाम के सम्बन्ध में ये भ्रम सं० १६६९ में लिखी गई प्रति तथा इससे मिलती जुलती अन्य प्रतियों में कवि के दोनों नामों के उल्लेख के कारण उत्पन्न हो गये हैं लेकिन ऐसी प्रतियों में चूँकि बीसलदेव तृतीय और रानी राज- मती की प्रेमगाथा चार खण्डों में गायी गयी है इसलिये इनकी प्रामाणिकता में सन्देह उत्पन्न होता है। और, तब इन प्रतियों के आधार पर नरपति और नाल्ह को दो विभिन्न कवि मानना उपयुक्त न होगा। उपर्युक्त दोनों पंक्तियाँ भी सं० १६६९ में लिखी गई प्रति से उद्धृत की गई हैं। इन पंक्तियों का अर्थ साधारण रूप से एक ही व्यक्ति के नाम का बोधक है; खींच तान कर इसका अर्थ दो विभिन्न व्यक्तियों के लिये लगा भले ही लिया जाय । फिर १६६९ वाली प्रति से अधिक प्रामाणिक और प्राचीन प्रति १६३३ वाली प्रति के, जो अबतक की प्राप्त प्रतियों में प्राचीनतम है, आधार पर यही कहा जा सकता है कि नरपति और नाल्ह दोनों एक ही व्यक्ति थे। इस प्रति में कवि का नाम 'नरपति' पहले पद के अतिरिक्त और कहीं नहीं आता।² इसी प्रकार नाल्ह भी इसकी पद्य-संख्या ४,२ और इसके अतिरिक्त कहीं नहीं मिलता³ जिसके द्वारा यही सिद्ध होता है कि कवि का प्रचलित नाम नाल्ह था। १—वीरकाव्य पृ० १६०। २—करि जोडि नरपति भणई। जाणि करि रोहणी निमि तणउ सूरि ॥१॥ ३—तइ तूठी अक्खर जुड़इ। नाल्ह रसायण रस भरी गाइ । तुष्टी कई सारदा त्रिभुवन माय ॥५॥ संवत् सहस सत्तिहत्तरइ जाणि। नाल्ह कवीसरि कही अमृत वाणि ॥२४॥
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