भारतकोश
बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans

नरपति नाल्ह द्वारा

DevanagariHindipublished315 पृष्ठ

पृष्ठ 87, कुल 315 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 87
  • ५० - हिव छंडी स्वामी थारूरी आस। जोगणि होई सेवं बनवास। कहूं तप तपूं बनर बसी। कहू सरीर संपउं देसि फेडारि। कहिहि, हिमालइ माहि गिलउ। स्वामी घण मरिसी गंग नई बारि ॥ ७० ॥ संताप, निद्रा भंग, कृशता, प्रलापादि विप्रलम्भ शृंगार के अनुभाव के कारण प्रवात्स्यत्पतिका नायिका की कृशता के चित्र अनेक लक्षण और लक्ष्य ग्रन्थों के रचयिता आचार्यों तथा रीतिकालीन कवियों द्वारा उपस्थित किए गये हैं। रासो का नायक भी यद्यपि न तो लक्षण या लक्ष्य ग्रंथ की रचना कर रहा था और न उसका उद्देश्य नायिकाभेद की रचना करना था, फिर भी रानी राजमती की कृशता का चित्र जो उसने चित्रित किया है वह रीतिकालीन कवियों अथवा उर्दू के शायरों के ऐसे चित्रित किये गये चित्र से किसी रूप में कम नहीं है। रानी राजमती राजा के विरह में इतनी कृशगात हो गयी है कि उसकी अँगुली की अँगूठी उसकी बांह में आ जाती है।¹ देखिये कवि कहता है कि— गोरही घइली छइ बंभणक जाइ। करि जोड़ी थारइ लागू पाइ। राजमती करइ बीनती। पंड्या कहिज्यो धण का नांह नई जाइ। आँगुली थारूी मुद्रड़ी। ढलिकन आवइ हो धणकीय बाह ॥ १४२ ॥ रसराज शृंगार का जो निखरा सौन्दर्य हमें वियोग में देखने को मिलता है १—सुनहु स्याम ब्रज में लगी दसन दसा की ज्योति। जहँ मुंदरी अंगुरीन की बाह में ढीली होति ॥ × × × तुम पूछत कहि मुद्रिके, मौन होत यहि नाम। कंकन की पदवी दई तुम बिन या कहँ राम ॥—केशव × × × जीवन की अब हे कवि आस न मोहि। कनुगुरिया की मुंदरी कंकन मोहि ॥—तुलसीदास