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बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans

नरपति नाल्ह द्वारा

DevanagariHindipublished315 पृष्ठ

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पृष्ठ 96

बीसलदेव रासो के छन्द इसकी अस्तव्यस्त भाषा और गणना-शून्य मात्राओं से जड़ित रहने के कारण एक समस्या अवश्य उपस्थित करते हैं लेकिन सुविधा यह भी है कि आरम्भ से इति तक प्रायः एक ही प्रकार के छन्द का प्रयोग हुआ है। इसके कतिपय छन्दों की मात्राओं की गणना करने पर इस निर्णय पर पहुँ- चना पड़ता है कि छन्दों के चरणों की संख्या छप्पय छन्द के अनुसार प्रायः छः चरणों की होते हुए भी मात्राएँ प्रत्येक छन्द की भिन्न-भिन्न हैं और छप्पय छन्द के लिये आवश्यक नियम का—प्रथम चार चरणों की, रोला के (२४, २४ मात्रायें ११, १३ की यति से) तथा अन्तिम दो चरणों का उल्लाला के (२८, २८ मात्रायें, १५, १३ की यति से या २६, २६ मात्रायें १२, १४ की यति से) --पालन नहीं हुआ है। ये छंद, छंद-शास्त्र के नियमानुसार विषम कोटि के हैं—क्योंकि इनके प्रत्येक चरण की मात्रा असमान है और ये साधारण जाति के हैं क्योंकि प्रत्येक चरण की मात्रा ३२ से अधिक नहीं है । इस विचित्रता को देखते हुए ऐसा प्रतीत होता है कि ग्रन्थ का रचयिता छन्द-शास्त्र का पण्डित नहीं था । इसी- लिए बीसलदेव रासो की रचना छंद-शास्त्र की कसौटी पर खरी नहीं उतरती । यह कहने में अत्युक्ति न होगी कि 'संगीत' शब्द का प्रयोग यहाँ शास्त्रीय संगीत के लिये नहीं वरन् उस 'संगीत' के लिये किया गया है। जो मानव जीवन के अन्त- : दर्शन और साथ ही उसकी रागात्मक प्रवृत्तियों की अभिव्यक्ति में सहायता पहुँचाता है। पशु पक्षी तक में अनुभूति और उसकी अभिव्यक्ति की क्षमता है । आनन्द या दुःख के कारण जिस प्रकार मानव में आत्मप्रसार का भाव जागृत होता है उसी प्रकार पशु-पक्षियों में भी । वैज्ञानिकों ने तो यहाँ तक सिद्ध कर दिया है कि उद्भिद् जगत् में भी राग-द्वेषात्मक अनुभूति वर्त्तमान है । लेकिन जहाँ मानव ने वाणी द्वारा अपनी अनुभूतियों की अभिव्यक्ति को स्थायित्व देने की चेष्टा की है वहाँ पशु-पक्षी और उद्भिद् जगत् विवश हैं । पशु-पक्षी या उद्भिद् जगत् अपनी अनुभूतियों की अभिव्यक्ति को स्थायित्व मानव की तरह भले ही न दे सकें पर इतना तो स्वीकार करना ही पड़ेगा कि सरिता का कलकल निनाद, अमराई में बठे हुये पपीहे की 'पी कहाँ' 'पी कहाँ' की पुकार, नीड़ में सायंकाल लौटते हुए पक्षियों का कलरव, उषा के आगमन के साथ ही कलियों का विकसना स्थायी है और साथ ही है संगीतात्मक अर्थात् मधुर लययुक्त एव भावात्मक । मनुष्य ने अपनी अनुभूतियों को वाणी द्वारा संगीतात्मक रूप में अभिव्यक्त करने की चेष्टा कब से की यह कहना तो कठिन है लेकिन प्राचीन जातियों के