भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

Brahma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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१६२* संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *

तथा वनस्पतियोंको नमस्कार किया और अपने बच्चोंको सान्त्वना देकर व्याधसे कहा—'महाभाग! तुम्हारी ही कृपासे मेरे लिये ऐसा शुभ अवसर प्राप्त हुआ है। मैं पतिके साथ स्वर्गलोकमें जाती हूँ।' यों कहकर वह पतिव्रता कपोती आगमें प्रवेश कर गयी। इसी समय आकाशमें जय-जयकारकी ध्वनि गूँज उठी। तत्काल ही सूर्यके समान तेजस्वी अत्यन्त सुन्दर विमान उतर आया। दोनों दम्पति देवताके समान दिव्य शरीर धारण करके उसपर आरूढ़ हुए और आश्चर्यमें पड़े हुए व्याधसे प्रसन्न होकर बोले—'महामते! हम देवलोकमें जाते हैं और तुम्हारी आज्ञा चाहते हैं। तुम अतिथिके रूपमें हम दोनोंके लिये स्वर्गकी सीढ़ी बनकर आ गये। तुम्हें नमस्कार है।'

उन दोनोंको श्रेष्ठ विमानपर बैठे देख व्याधने अपना धनुष और पिंजड़ा फेंक दिया और हाथ जोड़कर कहा—'महाभाग! मेरा त्याग न करो। मैं अज्ञानी हूँ। मुझे भी कुछ दो। मैं तुम्हारे लिये आदरणीय अतिथि होकर आया था, इसलिये मेरे उद्धारका उपाय बतलाओ।'

उन दोनोंने कहा—व्याध! तुम्हारा कल्याण हो। तुम भगवती गोदावरीके तटपर जाओ और उन्हींको अपना पाप भेंट कर दो। वहाँ पंद्रह दिनोंतक डुबकी लगानेसे तुम सब पापोंसे मुक्त हो जाओगे। पापमुक्त होनेपर जब पुनः गौतमी गङ्गामें स्नान करोगे, तब अश्वमेध-यज्ञका फल पाकर अत्यन्त पुण्यवान् हो जाओगे। नदियोंमें श्रेष्ठ गोदावरी ब्रह्मा, विष्णु तथा महादेवजीके अंशसे प्रकट हुई हैं। उनके भीतर पुनः गोते लगाकर जब तुम अपने मलिन शरीरको त्याग दोगे, तब निश्चय ही श्रेष्ठ विमानपर आरूढ़ हो स्वर्गलोकमें पहुँच जाओगे।

उन दोनोंकी बात सुनकर व्याधने वैसा ही किया, फिर वह भी दिव्य रूप धारण करके एक श्रेष्ठ विमानपर जा बैठा। कपोत, कपोती और व्याध—तीनों ही गौतमी गङ्गाके प्रभावसे स्वर्गमें चले गये। तभीसे वह स्थान कपोततीर्थके नामसे विख्यात हुआ। वहाँ स्नान, दान, पितरोंकी पूजा, जप और यज्ञ आदि कर्म करनेपर वे अक्षय फलको देनेवाले होते हैं।


दशाश्वमेधिक और पैशाचतीर्थका माहात्म्य

ब्रह्माजी कहते हैं— गोदावरी गङ्गामें कार्तिकेयजीका भी एक तीर्थ है, जो बहुत उत्तम है। वह कौमार-तीर्थके नामसे भी प्रसिद्ध है। उसका नाम सुननेमात्रसे मनुष्य कुलीन और रूपवान् होता है। उसके आगे कृत्तिकातीर्थ है, जिसके श्रवणमात्रसे सोमपानका फल मिलता है। महामुने! अब दशाश्वमेधिक तीर्थका माहात्म्य सुनो। उसके श्रवणमात्रसे अश्वमेध-यज्ञके फलकी