भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

Brahma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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१६८ * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *

कौन है, जो मुनिका रूप धारण करके तूने मेरे साथ यह पापकर्म किया है?' यह कहती हुई वह भयके मारे शय्यासे सहसा उठकर खड़ी हो गयी। पापाचारी इन्द्र भी मुनिके भयसे बिलाव बन गया। अहल्या थर-थर काँप रही थी। उसके वेश-भूषा बिगड़ चुके थे। अपनी प्यारी पत्नीको कलङ्कित हुई देख महर्षिने क्रोधमें आकर कहा— 'तुमने यह दुःसाहस कैसे किया?' उनके इस प्रकार पूछनेपर देवी अहल्याने लज्जावश कोई उत्तर नहीं दिया। तब मुनि उस जारकी खोज करने लगे। इतनेमें उस बिलावपर उनकी दृष्टि पड़ी। अरे! ठीक-ठीक बता, तू कौन है? यदि झूठ बोलेगा तो मैं तुझे अभी भस्म कर दूँगा।'

इन्द्र हाथ जोड़कर खड़ा हो गया और बोला—'तपोधन! मैं शचीका स्वामी इन्द्र हूँ, मुझसे ही यह पाप हो गया है। मैंने जो कुछ कहा है, वह सत्य है। ब्रह्मन्! कामदेवके बाणोंसे जिनका हृदय विदीर्ण हो चुका है, वे कौन-सा दुष्कर्म नहीं करते। आप करुणाके सागर हैं, मुझ महापापीको क्षमा करें। साधु पुरुष अपराधीपर भी कठोरता नहीं दिखाते।'

गौतम बोले—इन्द्र! तूने स्त्रीकी योनिमें आसक्त होकर यह पापकर्म किया है, अतः तेरे शरीरमें योनिके सहस्रों चिह्न हो जायँगे।

इसके बाद मुनिने अहल्यासे भी कुपित होकर कहा—'तू सूखी नदी हो जा।'

अहल्या बोली—भगवन्! जो पापिनी स्त्रियाँ मनसे भी दूसरे पुरुषकी कामना करती हैं, वे तथा उनके समस्त पूर्वज भी अक्षय नरकोंमें पड़ते हैं। आप कृपा करके मेरी बातोंपर ध्यान दें। यह इन्द्र आपका रूप धारण करके मेरे पास आया था। ये सब लोग इस बातके साक्षी हैं।

रक्षकोंने कहा—'ऐसी ही बात है। अहल्या ठीक कहती हैं।' मुनिने भी ध्यानके द्वारा सच्ची बातको जान लिया और शान्त होकर अपनी पतिव्रता पत्नीसे कहा—'कल्याणी! नदी होनेपर जब तुम सरिताओंमें श्रेष्ठ गौतमी गङ्गासे मिलोगी, उस समय पुनः अपने स्वरूपको प्राप्त कर लोगी।' महर्षिका वचन सुनकर पतिव्रता अहल्याने वैसा ही किया। गौतमी गङ्गासे मिलनेपर पुनः उसका वही स्वरूप हो गया, जैसा मैंने बनाया था। तत्पश्चात् देवराज इन्द्रने हाथ जोड़कर महर्षि गौतमसे कहा—'मुनिश्रेष्ठ! अपने घरपर आये हुए मुझ पापिष्ठकी रक्षा कीजिये।' यों कहकर इन्द्र उनके चरणोंमें गिर पड़े। यह देख महर्षिने कृपापूर्वक कहा—'पुरंदर! तुम्हारा कल्याण हो। तुम गोदावरीके तटपर जाओ और उसमें स्नान करो। इससे तुम्हारे सारे पाप क्षणभरमें धुल जायँगे। तुम्हारे शरीरमें योनिके जो सहस्रों चिह्न हैं, वे नेत्रोंके रूपमें परिणत हो जायँगे। तुम सहस्राक्ष हो जाओगे। नारद! गौतमीके प्रभावसे ये