भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

Brahma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished434 पृष्ठ

पृष्ठ 173, कुल 434 में से

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पृष्ठ 173

* गारुड़तीर्थ और गोवर्धनतीर्थकी महिमा * १७१


इसका पता लगा, तब वे भी घोड़ेका रूप धारण करके उसके पास गये। पतिव्रता उषा परपुरुषकी आशङ्कासे भागकर भारतवर्षमें गौतमीके तटपर आयी। वहाँ उसका पतिके साथ समागम हुआ, जिससे अश्विनीकुमारोंकी उत्पत्ति हुई। वह स्थान अश्वतीर्थ, भानुतीर्थ और पञ्चवटी आश्रमके नामसे विख्यात हुआ। तापी और यमुना दोनों सूर्यकी कन्याएँ थीं। वे गौतमी-तटपर अपने पितासे मिलनेके लिये अरुणा-वरुणा नामक नदियोंके रूपमें आयी थीं। उन दोनोंका जहाँ गङ्गामें संगम हुआ है, वह बहुत उत्तम तीर्थ है। उसमें भिन्न-भिन्न देवताओं और तीर्थोंका पृथक्-पृथक् समागम हुआ है। उक्त संगममें सत्ताईस हजार तीर्थोंका समुदाय है। वहाँ किया हुआ स्नान और दान अक्षय पुण्य देनेवाला है। नारद! उस तीर्थके स्मरण, कीर्तन और श्रवणसे भी मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो धर्मवान् और सुखी होता है।


गारुड़तीर्थ और गोवर्धनतीर्थकी महिमा

**ब्रह्माजी कहते हैं—**नारद! गारुड नामक तीर्थ सब विघ्नोंकी शान्ति करनेवाला है। उसके प्रभावका वर्णन करता हूँ, ध्यान देकर सुनो। शेषनागके एक महाबली पुत्र था, जो मणिनागके नामसे प्रसिद्ध हुआ। उसे सदा गरुड़का भय बना रहता था, अतः उसने अपनी भक्तिके द्वारा भगवान् शंकरको संतुष्ट किया। प्रसन्न होनेपर भगवान् महेश्वरने कहा—'नाग! कोई वर माँगो।' नागने कहा—'प्रभो! मुझे गरुड़से अभय-दान दीजिये।' भगवान् शिवने कहा—'ऐसा ही होगा। तुम्हें गरुड़से भय न हो।' वरदान पाकर मणिनाग गरुड़से निर्भय हो बाहर निकला। वह क्षीरसागरके समीप, जहाँ भगवान् विष्णु शयन करते हैं, इधर-उधर विचरने लगा। जहाँ गरुड़ निवास करते थे, उस स्थानपर भी वह जाया करता। गरुड़ने उस नागको निर्भय विचरते देख पकड़ लिया और अपने घरमें लाकर डाल दिया।

इसी बीचमें नन्दीने जगदीश्वर भगवान् शिवसे कहा—'देवेश्वर! अब मणिनाग नहीं आता है। जान पड़ता है गरुड़ने उसे खा लिया या बाँध रखा है। यदि वह जीवित होता तो यहाँ आये बिना न रहता।' नन्दीकी बात सुनकर भगवान् शिवने नागकी अवस्थाको जान लिया और कहा—'वह नाग गरुड़के घरमें बँधा पड़ा है। तुम शीघ्र जाकर जगदीश्वर भगवान् विष्णुकी स्तुति करो और गरुड़के द्वारा बन्धनमें डाले हुए नागको मेरे कहनेसे ले आओ।' प्रभुकी बात सुनकर नन्दी स्वयं ही लक्ष्मीपतिके पास उपस्थित हुए और भगवान् शिवकी कही हुई बातें वहाँ निवेदन कीं। तब भगवान् नारायणने प्रसन्न होकर गरुड़से कहा—'विनतानन्दन! मेरी बात मानकर नन्दीको वह नाग लौटा दो।' गरुड़ने नाग देना स्वीकार नहीं किया और गर्वसे कहा—'मैं आपका भृत्य हूँ; मैं नागको लाया, आप उसे नन्दीको दे रहे हैं। स्वामी तो सेवकोंको दिया करते हैं, परंतु आप तो मेरी प्राप्य वस्तुको छीन रहे हैं। मेरी शक्ति आप जानते ही हैं। मेरे ही बलसे तो आपने संग्राममें दैत्योंपर विजय प्राप्त की है।'

भगवान् विष्णुने गरुड़की बात सुनकर सबके सामने हँसकर कहा—'पक्षिराज! ठीक है, तुम्हारे ही बलसे मैंने असुरोंपर विजय पायी है।' फिर भगवान्ने क्रोध न करके कहा—'गरुड़! मैं

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