भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

Brahma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished434 पृष्ठ

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पृष्ठ 175

* श्वेततीर्थ, शुक्रतीर्थ और इन्द्रतीर्थका माहात्म्य * | १७३

गौओंके बिना जीवन नहीं रह सकता।' उस समय मैंने देवताओंसे कहा—'जाओ, भगवान् शंकरसे याचना करो।' तदनन्तर उन्होंने भगवान् शंकरकी स्तुति करके उनसे सब हाल कहा। महादेवजीने भी देवताओंको उत्तर दिया—'इस विषयमें नन्दी जानते हैं।' तब सब देवता नन्दिकेश्वरके पास जाकर बोले—'हमें जगत्‌का उपकार करनेवाली गौएँ दीजिये।' नन्दी बोले— 'आपलोग गो-यज्ञ कीजिये, तभी दिव्य और मानस गौएँ प्राप्त होंगी।' तत्पश्चात् गौतमी गङ्गाके तटपर देवताओंने गोयज्ञका आयोजन किया। फिर वहाँसे गौएँ बढ़ने लगीं। तभीसे वह तीर्थ 'गोवर्धन' नामसे प्रसिद्ध हुआ। वह देवताओंकी प्रीति बढ़ानेवाला है। मुनिश्रेष्ठ ! वहाँ किया हुआ केवल स्नान भी सहस्र गो-दानोंका फल देनेवाला है।


श्वेततीर्थ, शुक्रतीर्थ और इन्द्रतीर्थका माहात्म्य

ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! श्वेततीर्थ तीनों लोकोंमें विख्यात है। उसके श्रवणमात्रसे मनुष्य सब पापोंसे छुटकारा पा जाता है। पूर्वकालमें श्वेत नामके एक ब्राह्मण थे, जो महर्षि गौतमके प्रिय सखा थे। वे गोदावरीके तटपर रहकर अतिथियोंके स्वागत-सत्कारमें लगे रहते और मन-वाणी तथा क्रियाद्वारा भगवान् शिवका भजन करते थे। वे सदा भगवान् सदाशिवकी पूजा और ध्यान करते रहते थे। शिवके भजनमें ही उनकी आयु पूरी हो गयी। तब यमराजके दूत उन्हें ले जानेके लिये आये, परंतु नारदजी ! वे ब्राह्मण-देवताके घरमें प्रवेश न कर सके। जब ब्राह्मणकी मृत्युका समय व्यतीत हो गया, तब चित्रकने मृत्युसे पूछा—'मृत्यो ! श्वेतका जीवन समाप्त हो चुका है, वह अबतक क्यों नहीं आया? तुम्हारे दूत भी अभीतक नहीं लौटे। ऐसा होना उचित नहीं।' यह सुनकर मृत्युको बड़ा क्रोध हुआ और वे स्वयं ही श्वेतके घरपर पधारे। उनके दूत भयभीत होकर बाहर ही खड़े थे। उन्हें देखकर मृत्युने पूछा—'दूतो! यह क्या बात है?' दूत बोले—'श्वेत भगवान् शिवके द्वारा सुरक्षित हैं। हम उनकी ओर आँख उठाकर देख भी नहीं सकते। जिनके ऊपर भगवान् शंकर प्रसन्न हो जायँ, उन्हें भय कैसा।'

तब मृत्युने अपना फंदा हाथमें लेकर स्वयं ही ब्राह्मणके घरमें प्रवेश किया। ब्राह्मण तो भक्तिपूर्वक भगवान् शिवकी पूजा कर रहे थे। उन्हें न तो मृत्युके आनेका पता था और न यमदूतोंके। श्वेतके समीप पाशधारी मृत्युको खड़ा देख दण्डधारी भैरवने विस्मित होकर पूछा—'मृत्युदेव! यहाँ क्या देखते हो?' मृत्युने उत्तर दिया—'मैं श्वेतको ले जानेके लिये यहाँ आया हूँ, अतः इन्हींको देखता हूँ।' भैरवने कहा—'लौट जाओ।' मृत्युने श्वेतपर अपना फंदा फेंका। यह देखकर भैरव कुपित हो उठे। उन्होंने शिवके दिये हुए दण्डसे मृत्युपर गहरी चोट की। मृत्युदेवता पाश हाथमें लिये हुए ही धरतीपर गिर पड़े। मृत्युको मारा गया देख यमदूत भाग गये। उन्होंने मृत्युके वधका समाचार यमराजसे कहा। यह सुनकर महिषवाहन यमराजको बड़ा क्रोध हुआ। उन्होंने अधिक बलवान् चित्रगुप्त, अपनी रक्षा करनेवाले यमदण्ड, महिष, भूत, वेताल तथा आधि-