भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

Brahma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished434 पृष्ठ

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पृष्ठ 177

* श्वेततीर्थ, शुक्रतीर्थ और इन्द्रतीर्थका माहात्म्य * १७५

आदि सब देवता ठहर गये और देवाधिदेव महेश्वरकी पूजा करने लगे। उस समय वहाँ एक लाख बारह हजार तीर्थ एकत्रित हुए थे। इसी प्रकार गोदावरीके दक्षिण-तटपर तीस हजार तीर्थ एकत्रित हुए। यही श्वेततीर्थका पवित्र उपाख्यान है। जहाँ मृत्यु देवता मरकर गिरे थे, वह स्थान मृत्युतीर्थ कहलाता है। वहाँ किया हुआ स्नान और दान सब पापोंका नाश करनेवाला है। उसके माहात्म्यका श्रवण, पठन और स्मरण अन्तःकरणके मलको धोनेवाला और सब लोगोंको भोग तथा मोक्ष प्रदान करनेवाला है।

इसके आगे शुक्रतीर्थ है, जो मनुष्योंको सब प्रकारकी सिद्धि देनेवाला है। वह सब पापोंको शान्त करनेवाला तथा सब प्रकारकी व्याधियोंका नाशक है। अङ्गिरा और भृगु—ये दो परम धर्मात्मा ऋषि हुए हैं। इन दोनोंके दो-दो पुत्र हुए, जो बड़े ही विद्वान् और रूप तथा बुद्धिसे सुशोभित थे। अङ्गिराके पुत्रका नाम था जीव और भृगुके पुत्रका नाम था कवि। ये दोनों अपने माता-पिताके अधीन रहते थे। जब दोनोंका यज्ञोपवीत-संस्कार हो गया, तब उनके पिता परस्पर कहने लगे—'हम दोनोंमेंसे एक ही इन दोनों पुत्रोंका शिक्षक हो। इससे एक ही शासन करेगा और दूसरा सुखसे बैठा रहेगा।' यह सुनकर अङ्गिराने कहा—'मैं कविको भी अपने पुत्रके समान ही पढ़ाऊँगा। वह सुखपूर्वक मेरे यहाँ रहे।'

अङ्गिराकी बात सुनकर भृगुने कहा—'ठीक है' और उन्होंने अपने पुत्र शुक्रको अङ्गिराकी सेवामें सौंप दिया। परन्तु अङ्गिरा उन दोनों बालकोंमें विषम बुद्धि रखते थे। इसलिये दोनोंको पृथक्-पृथक् पढ़ाते थे। बहुत दिनोंतक किसी प्रकार चलता रहा, तब एक दिन शुक्रने कहा—'गुरुदेव! आप मुझे प्रतिदिन विषमभावसे पढ़ाते हैं। गुरुओंके लिये यह उचित नहीं कि वे पुत्र और शिष्यमें भेदभाव समझें। जो लोग विषम बुद्धि रखते हैं, उनके पापकी कोई गणना नहीं है। आचार्य! अब मैंने आपको अच्छी तरह समझ लिया। आपको बारंबार नमस्कार करता हूँ। अब दूसरे किसी गुरुके यहाँ जाऊँगा। मुझे जानेकी आज्ञा दीजिये।'

इस प्रकार गुरु और बृहस्पतिसे पूछकर उनकी आज्ञा ले शुक्र चले गये। उन्होंने सोचा अब पूर्ण विद्या प्राप्त करके ही पिताके पास चलूँ। किन्तु किससे पूछूँ, कौन सबसे श्रेष्ठ गुरु हो सकता है? इन्हीं सब बातोंका विचार करते हुए शुक्रने महाप्राज्ञ गौतमके पास जाकर पूछा— 'मुनिश्रेष्ठ! बताइये, कौन मेरा गुरु हो सकता है? जो तीनों लोकोंका गुरु हो, उसीके पास मैं जाऊँगा।'

गौतमने कहा—जगद्गुरु भगवान् शंकर ही गुरु होने योग्य हैं।

शुक्रने पूछा—मैं कहाँ रहकर शङ्करजीकी आराधना करूँ?

गौतम बोले—गौतमी गङ्गामें स्नान करके पवित्र हो स्तोत्रोंद्वारा भगवान् शंकरको संतुष्ट करो। संतुष्ट होनेपर वे जगदीश्वर तुम्हें विद्या प्रदान करेंगे।

गौतमके कहनेसे शुक्र गोदावरीके तटपर गये और वहाँ स्नान करके पवित्र हो भगवान् शिवकी स्तुति करने लगे।

शुक्र बोले—प्रभो ! मैं बालक हूँ। मेरी बुद्धि बालककी ही है और आप बालचन्द्रमाको मस्तकपर धारण करनेवाले हैं। मुझे आपकी स्तुति करनेका कुछ भी ज्ञान नहीं है। केवल आपको नमस्कार करता हूँ। गुरुने मुझे त्याग दिया है। मेरा कोई सुहृद् अथवा सखा नहीं है। आप ही सब प्रकारसे मेरे प्रभु हैं। जगन्नाथ!