भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

Brahma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished434 पृष्ठ

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पृष्ठ 189
  • चक्रतीर्थ और पिप्पलतीर्थकी महिमा, महर्षि दधीचि तथा उनके पुत्रकी कथा * १८७

होती है तथा प्रलयकालमें यह सब जिनके ही भीतर लयको प्राप्त होता है, वे संसारको शरण देनेवाले जगदात्मा उमा-महेश्वर मुझे शरण दें। देवताओंके समुदायमें एक महान् उत्सवके अवसरपर गिरिराजकुमारी पार्वतीेने महादेवजीसे कहा था— 'ईश! आप मेरे दोनों चरण पकड़ें।' इसपर शिवजीने अत्यन्त प्रीतिवश पार्वतीके जिन दोनों शरणागतपालक चरणोंको ग्रहण किया था, वे मुझे शरण दें।

यह स्तुति सुनकर उमावर महेश्वर प्रकट हो गये। भगवती उमाने कहा— 'तुमलोगोंका मनोरथ क्या है? बताओ, मैं उसे पूर्ण करूँगी। तुम्हारा कल्याण हो। तुम सब लोग कृतार्थ हो गये। जो वस्तु देवताओंके लिये भी दुर्लभ हो, वह भी मैं तुम्हें दूँगी।'

पुरूरवा बोले— 'जगदम्बिके! राजा इल अज्ञानवश आपके वनमें घुस गये थे। देवेश्वरि! आप उनके उस अपराधको क्षमा करें और पुनः उन्हें पुरुषत्व दें।

पार्वतीने भगवान् शंकरकी सम्मतिके अनुसार 'तथास्तु' कहकर उन सबकी प्रार्थना स्वीकार की। इसके बाद शिवजीने कहा— 'राजा इल गौतमी गङ्गामें स्नान करनेमात्रसे पुरुष हो जायेंगे।' तब बुधकी पत्नी इलाने गङ्गामें स्नान किया। स्नानके पश्चात् इलाके शरीरसे जो जल चू रहा था, उसके साथ उसके नारीजनोचित सौन्दर्य, नृत्य और संगीत भी गङ्गाकी धारामें मिल गये। वे ही नृत्या, गीता और सौभाग्या नामकी नदियोंके रूपमें परिणत हुए। वे नदियाँ भी गङ्गामें आ मिलीं। इससे वहाँ तीन पवित्र संगम हो गये। उनमें किया हुआ स्नान और दान इन्द्रपदकी प्राप्ति करानेवाला है। शिव और पार्वतीके प्रसादसे पुरुषत्व प्राप्त करनेके पश्चात् राजा इलने महान् अभ्युदयकी सिद्धिके लिये वहाँ अश्वमेध-यज्ञ किया। पुरोहित वसिष्ठ, अपनी पत्नी, पुत्र, अमात्य, सेना और कोशको भी लाकर उन्होंने वह यज्ञ सम्पन्न किया। दण्डक वनमें इलने चतुरङ्गिणी सेनासहित राज्यकी स्थापना की। वहाँ इलके नामसे विख्यात उनका नगर भी है। सूर्यवंशकी परम्परामें जो उन्होंने पहले पुत्र उत्पन्न किये थे, उनको राज्यपर अभिषिक्त करके पीछे स्नेहवश पुरूरवाका भी अभिषेक किया। ये राजा पुरूरवा ही चन्द्रवंशके प्रवर्तक हुए। जहाँ राजाको पुरुषत्वकी प्राप्ति हुई, वहाँ गौतमीके दोनों तटोंपर सोलह हजार तीर्थोंका निवास है। वहाँ इलेश्वर नामक भगवान् शंकरकी भी स्थापना हुई है। उन तीर्थोंमें स्नान और दान करनेसे सम्पूर्ण यज्ञोंका फल प्राप्त होता है।


चक्रतीर्थ और पिप्पलतीर्थकी महिमा, महर्षि दधीचि, उनकी पत्नी गभस्तिनी तथा उनके पुत्र पिप्पलादके त्यागकी अद्भुत कथा

ब्रह्माजी कहते हैं— चक्रतीर्थ ब्रह्महत्या आदि पापोंका नाश करनेवाला है। वहाँ भगवान् शंकर चक्रेश्वरके नामसे निवास करते हैं। उन्हींसे भगवान् विष्णुको चक्र प्राप्त हुआ था। श्रीविष्णुने वहाँ रहकर चक्रके लिये भगवान् शंकरकी आराधना की थी। इसीलिये उसे चक्रतीर्थ कहते हैं। उसके श्रवणमात्रसे मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। चक्रतीर्थके बाद पिप्पलतीर्थ है। उसकी महिमाका वर्णन करनेमें शेषनाग भी समर्थ नहीं हैं। नारद! चक्रेश्वर ही पिप्पलेश्वर हैं। उनके नामका कारण