भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

Brahma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished434 पृष्ठ

पृष्ठ 191, कुल 434 में से

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पृष्ठ 191

* चक्रतीर्थ और पिप्पलतीर्थकी महिमा, महर्षि दधीचि तथा उनके पुत्रकी कथा * १८९

रोका—'मुने! यह देवताओंका कार्य विरोध उत्पन्न करनेवाला है। अतः इसमें आपको पड़नेकी क्या आवश्यकता है? जो शास्त्रोंका ज्ञान प्राप्त करके परमार्थ-तत्त्वमें स्थित हो चुके हैं, संसारके कार्योंमें जिनकी कोई आसक्ति नहीं है, उन्हें दूसरोंके लिये ऐसा संकट मोल लेनेसे क्या लाभ, जिससे न इस लोकमें सुख है और न परलोकमें। विप्रवर! मेरी बातें ध्यान देकर सुनो। यदि आपने इन आयुधोंको स्थान दे दिया तो इन देवताओंके शत्रु आपसे भी द्वेष करेंगे। यदि इनमेंसे कोई अस्त्र नष्ट हुआ या चोरी चला गया तो ये देवता भी कुपित होकर हमारे शत्रु बन जायेंगे। अतः मुनीश्वर! आप वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ हैं। आपके लिये इस पराये द्रव्यमें ममत्व जोड़ना ठीक नहीं। यदि धन देनेकी शक्ति हो तो याचकको देना ही चाहिये—उसमें कुछ विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है। यदि धन देनेकी शक्ति न हो तो साधु पुरुष केवल मन, वाणी तथा शारीरिक क्रियाओंद्वारा दूसरोंका कार्य-साधन करते हैं। प्राणनाथ! पराये धनको अपने यहाँ धरोहरके रूपमें रखना साधु पुरुषोंने कभी स्वीकार नहीं किया है। इसका उन्होंने सदा बहिष्कार ही किया है। अतः आप यह कार्य न कीजिये।'*

अपनी प्यारी पत्नीकी यह बात सुनकर ब्राह्मणने कहा—‘'भद्रे! मैं देवताओंकी प्रार्थनापर पहले ही 'हाँ' कह चुका हूँ। अब 'नहीं' कर दूँ तो मुझे सुख नहीं मिलेगा।' पतिका कथन सुनकर ब्राह्मणी यह सोचकर चुप हो गयी कि दैवके सिवा और किसीका किसीपर वश नहीं चल सकता। देवतालोग अपने अत्यन्त तेजस्वी अस्त्र आश्रमपर रखकर मुनीश्वरको नमस्कार करके कृतार्थ हो अपने-अपने लोकमें चले गये। देवताओंके चले जानेपर मुनि अपनी पत्नीके साथ धर्ममें तत्पर हो प्रसन्नतापूर्वक वहाँ रहने लगे। इस प्रकार एक हजार दिव्य वर्ष बीत गये। तब दधीचिने अपनी पत्नीसे कहा—'देवि ! देवता यहाँसे अस्त्र ले जाना नहीं चाहते और दैत्य मुझसे द्वेष करते हैं। अब तुम्हीं बताओ—क्या करना चाहिये?' पत्नीने विनयपूर्वक कहा—'नाथ ! मैंने तो पहले ही निवेदन किया था। अब आप ही जानें और जो उचित हो, सो करें। दैत्योंमें जो बड़े-बड़े वीर, तपस्वी और बलवान् हैं, वे इन अस्त्र-शस्त्रोंको निश्चय ही हड़प लेंगे।' तब दधीचिने उन अस्त्रोंकी रक्षाके लिये एक काम किया—उन्होंने पवित्र जलसे मन्त्र पढ़ते हुए अस्त्रोंको नहलाया। फिर वह सर्वास्त्रमय परम पवित्र और तेजयुक्त जल स्वयं पी लिया। तेज निकल जानेसे वे सभी अस्त्र-शस्त्र शक्तिहीन हो गये, अतः क्रमशः समयानुसार नष्ट हो गये। तदनन्तर देवताओंने आकर दधीचिसे कहा—'मुनिवर ! हमारे ऊपर शत्रुओंका महान् भय आ पहुँचा है। अतः हमने जो अस्त्र आपके यहाँ रख दिये थे, उन्हें इस समय दे दीजिये।' दधीचिने कहा—'आपलोग बहुत दिनोंतक उन्हें लेने नहीं आये। अतः दैत्योंके भयसे हमने उन अस्त्रोंको पी लिया है। अब वे हमारे शरीरमें स्थित हैं। इसलिये जो उचित हो, वह कहें।' यह सुनकर देवताओंने विनीत भावसे कहा—'मुनीश्वर! इस समय तो हम इतना ही कह सकते हैं कि अस्त्र दे दीजिये।' ब्राह्मणने कहा—'सब अस्त्र मेरी


* चेदस्ति शक्तिर्द्रव्यदाने ततस्ते दातव्यमेवार्थिने किं विचार्यम्। नो चेत् सन्तः परकार्याणि कुर्युर्वाग्भिर्मनोभिः कृतिभिस्तथैव ॥
परस्वसंधारणमेतदेव सद्भिर्नि रस्तं त्यज कान्त सद्यः ॥
(११०। २९-३०)

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