भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

Brahma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२०४* संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *

जो भक्तिपूर्वक इस वैदिकी गाथाका श्रवण, स्मरण अथवा पाठ करे, उसे तुम पार लगाओ।'

गङ्गाके किनारे जिस स्थानपर राजा सोमके साथ ओषधियोंने इस वैदिकी गाथाका पाठ किया था, वह धान्यतीर्थ कहलाता है। उस दिनसे उसके कई नाम हो गये—औषध्यतीर्थ, सौम्यतीर्थ, अमृततीर्थ, वेदगाथातीर्थ और मातृतीर्थ। जो मनुष्य इन तीर्थोंमें स्नान, जप, होम, दान, पितृ-तर्पण और अन्न-दान करता है, उसका वह सब कर्म अक्षय फल देनेवाला होता है। वहाँ दोनों तटोंपर एक हजार छः सौ तीर्थ हैं, जो सब पापोंका नाश करनेवाले और सब प्रकारकी सम्पत्ति बढ़ानेवाले हैं।

वहाँ विदर्भा-संगम और रेवती-संगमतीर्थ भी हैं। अब उनका वृत्तान्त बतलाऊँगा। पुराणवेत्ता पुरुष उसे जानते हैं। महर्षि भरद्वाज एक बड़े तपस्वी महात्मा थे। उनकी बहिनका नाम रेवती था। वह कुरूपा थी। उसका स्वर बड़ा विकृत था। प्रतापी भरद्वाज गङ्गाजीके दक्षिण-तटपर बैठकर बड़ी चिन्ता करने लगे कि 'इस भयंकर आकारवाली अपनी बहिनका विवाह किसके साथ करूँ ? कोई भी तो इसे ग्रहण नहीं करता। अहो, किसीके कन्या न हो। कन्या केवल दुःख देनेवाली होती है। जिसके कन्या हो, उस प्राणीकी जीते-जी पग-पगपर मृत्यु होती रहती है।' इस प्रकार वे अपने सुन्दर आश्रमपर तरह-तरहके विचार कर रहे थे। इतनेमें ही कठनामके एक मुनि वहाँ भरद्वाज मुनिका दर्शन करनेके लिये आये। उनकी अवस्था सोलह वर्षकी थी। शरीर सुन्दर था। वे शान्त, जितेन्द्रिय और सद्गुणोंकी खान थे। कठने आते ही भरद्वाजको प्रणाम किया। भरद्वाजने उनका विधिपूर्वक पूजन किया और आश्रमपर पधारनेका कारण पूछा।

कठने कहा—'मैं विद्यार्थी हूँ और इसी उद्देश्यसे आपका दर्शन करने आया हूँ। जो उचित हो, वह कीजिये।' भरद्वाजने कठसे कहा—'महामते ! तुम्हारी जो इच्छा हो, पढ़ो। मैं पुराण, स्मृति, वेद तथा अनेक प्रकारके धर्मशास्त्र—सब जानता हूँ। तुम शीघ्र अपनी रुचि बतलाओ। कुलीन, धर्मपरायण, गुरु-सेवक तथा सुनी हुई विद्याको तत्काल धारण करनेवाला शिष्य बड़े पुण्यसे प्राप्त होता है।'

कठने कहा—ब्रह्मन् ! मैं निष्पाप, सेवापरायण, भक्त, कुलीन और सत्यवादी शिष्य हूँ। मुझे अध्ययन कराइये।

'एवमस्तु' कहकर भरद्वाजने कठको सम्पूर्ण विद्या पढ़ायी। विद्या पाकर कठ बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने भरद्वाजसे कहा—'गुरुदेव ! आपको नमस्कार है। मैं आपके मनके अनुकूल दक्षिणा देना चाहता हूँ। आप कोई दुर्लभ वस्तु भी माँग सकते हैं। बताइये, क्या दूँ? जो शिष्य अपने गुरुसे विद्या प्राप्त करके भी उन्हें मोहवश दक्षिणा नहीं देते,