भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

Brahma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 213
  • श्रीरामतीर्थकी महिमा * २११

पुरोहितके पदपर प्रतिष्ठित थे, उस समय देशमें न रोग थे न मानसिक चिन्ताएँ। न तो अनावृष्टि होती थी और न अकाल ही पड़ता था। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्रोंको और चारों आश्रमोंको भी पृथक्-पृथक् बड़ा सुख मिलता था। एक समयकी बात है, देवताओं और दानवोंमें राज्यके लिये युद्ध छिड़ गया। न तो उसमें देवताओंकी जीत होती थी और न दैत्यों एवं दानवोंकी ही। वह युद्ध कई दिनोंतक लगातार चलता रहा। इसी बीचमें आकाशवाणी हुई—‘राजा दशरथ जिनका पक्ष ग्रहण करेंगे, वे ही विजयी होंगे, दूसरे नहीं।’ यह सुनकर देवता और दानव दोनों अपनी विजयके लिये राजाके पास चले। देवताओंकी ओरसे वायु शीघ्र जा पहुँचे और राजासे बोले—‘महाराज! देव-दानव-संग्राममें आपको चलना चाहिये। वहाँ यह आकाशवाणी सुनायी दी है कि जिस ओर राजा दशरथ रहेंगे, उसी पक्षकी जीत होगी; अतः आप देवताओंका पक्ष ग्रहण कीजिये, जिससे देवता विजयी हों।’

वायुकी यह बात सुनकर राजा दशरथने कहा—‘वायुदेव! आप सुखपूर्वक पधारें। मैं अवश्य चलूँगा।’ वायुके चले जानेपर दैत्यगण राजाके पास आये और बोले—‘भगवन्! हमारी सहायता कीजिये। महाराज ! विजय आपपर ही अवलम्बित है, अतः आप दैत्यराजकी सहायता करें।’ राजा बोले—‘वायुदेवने पहले मुझसे प्रार्थना की है और मैंने देवताओंकी सहायता करनेका वचन दे दिया है; अतः दैत्य और दानव लौट जायें।’ राजा दशरथने वैसा ही किया। स्वर्गमें पहुँचकर उन्होंने दैत्यों, दानवों तथा राक्षसोंके साथ लोहा लिया। उस समय नमुचिके भाइयोंने देवताओंके देखते-देखते तीखे बाण मारकर राजाके रथकी धुरी तोड़ डाली। राजा बड़े वेगसे युद्धमें लगे थे। उन्हें धुरी टूटनेका पता न लगा। नारद! उस युद्धमें रानी कैकेयी भी राजाके पास ही बैठी थी। उसे रथकी अवस्थाका पता लग गया, परंतु उसने राजाको इस बातकी सूचना नहीं दी। धुरी टूटी देख उसने उसकी जगह अपना हाथ ही लगा दिया। यह बड़ा अद्भुत कार्य था। रथियोंमें श्रेष्ठ महाराज दशरथने कैकेयीके हाथसे थामें हुए रथके द्वारा दैत्यों और दानवोंपर विजय पायी, फिर देवताओंसे अनेक वर पाकर उनकी अनुमति ले वे पुनः अयोध्या लौट आये। आते समय मार्गके बीचमें जब महाराज दशरथने अपनी प्रिया कैकेयीकी ओर दृष्टिपात किया, तब उसका वह साहसपूर्ण कार्य देखकर उन्हें बड़ा विस्मय हुआ। नारद! इस कार्यसे प्रसन्न होकर राजाने कैकेयीको वर दिये। रानी कैकेयीने भी राजाकी आज्ञा स्वीकार करके इस प्रकार कहा—‘महाराज! आपके दिये हुए ये वर आपके ही पास रहें [आवश्यकता पड़नेपर ले लूँगी]।’*

राजा दशरथ पुरस्कारमें अनेक आभूषण देकर अपनी प्रिया कैकेयीके साथ अपने नगरको गये। विजयी होनेसे वे बहुत प्रसन्न थे। तदनन्तर बहुत समयके बाद मुनीश्वर ऋष्यशृङ्गकी कृपासे देवताओंकी कार्यसिद्धिके लिये राजा दशरथके चार देवोपम पुत्र हुए। कौसल्यासे राम, कैकेयीसे बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ भरत तथा सुमित्रासे लक्ष्मण और शत्रुघ्न


* स तु मध्ये महाराजो मार्गे वीक्ष्य तदा प्रियाम्। कैकेय्याः कर्म तद् दृष्ट्वा विस्मयं परमं गतः॥
ततस्तस्यै वरान् प्रादात्प्रींस्तु नारद सा अपि। अनुमान्य नृपोक्तं कैकेयी वाक्यमब्रवीत्॥
त्वयि तिष्ठन्तु राजेन्द्र त्वया दत्ता वरा अमी॥
(१२३।२९-३१)