संक्षिप्त ब्रह्मपुराण
Brahma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 237, कुल 434 में से
संदर्भ में पढ़ें* लक्ष्मीतीर्थ और भानुतीर्थका माहात्म्य * २३५
संसारका सुख तो क्षणभङ्गुर है। उसमें आप-जैसे महात्माओंकी आस्था कैसी।' मधुच्छन्दा बोले— 'राजन्! जहाँ पति-पत्नी दोनों एक-दूसरेके अनुकूल रहते हैं, वहीं धर्म, अर्थ और कामकी वृद्धि होती है। अतः अपनी पत्नीके प्रति यह अनुराग दूषण नहीं, भूषण ही मानना चाहिये।'
तदनन्तर राजा विशाल सेनाके साथ अपने देशमें आये। उन्होंने पत्नीके प्रेमकी परीक्षा करनेके लिये नगरसे यह संदेश भेज दिया—'राजा शर्याति दिग्विजयके लिये गये थे। वहाँ एक राक्षस पुरोहितसहित राजाको मारकर रसातलमें चला गया।' दूतके मुखसे यह संदेश सुनकर रानी इसकी सत्यताका पता लगाने लगीं, किन्तु मधुच्छन्दाकी पत्नीने तुरंत प्राण त्याग दिये। यह एक अद्भुत बात हो गयी। दूतोंने उसकी मृत्युका हाल महाराजसे जाकर कहा। साथ ही रानियोंकी चेष्टा भी बतायी। इससे राजाको बड़ा विस्मय और दुःख हुआ; उन्होंने दूतोंसे कहा—'तुमलोग जाकर ब्राह्मणीके शरीरकी रक्षा करो और नगरमें यह बात फैला दो कि राजा अपने पुरोहितके साथ राजधानीमें आ रहे हैं।'
यों कहकर राजा चिन्तासे व्याकुल हो उठे। इसी समय आकाशवाणी हुई—'राजन्! इस पृथ्वीपर गौतमी गङ्गा सब प्रकारके संकटोंकी शान्ति करनेवाली तथा पावन हैं, वे आपका सम्पूर्ण मनोरथ सिद्ध करेंगी।' आकाशवाणी सुनकर शर्याति गौतमीके तटपर गये। उन्होंने ब्राह्मणोंको धन दिया, पितरों और द्विजोंको तृप्त किया और अपने पुरोहितको धनके साथ यह कहकर भेजा—'आप अन्य तीर्थोंमें जाकर धन-दान करें।' राजाका यह सब कार्य पुरोहित नहीं जानते थे। उनके चले जानेपर राजाने सेनाको भी भेज दिया और स्वयं अकेले ही गङ्गातटपर रह गये। उन्होंने गङ्गा, सूर्य तथा देवताओंको सुनाकर कहा—'यदि मैंने दान, होम और प्रजा-पालन किया हो तो इस सत्यके प्रभावसे वह पतिव्रता ब्राह्मणी मेरी आयु लेकर जीवित हो जाय।' यों कहकर राजा अग्निमें प्रवेश कर गये। उसी समय पुरोहितकी पत्नी जीवित हो गयी।
राजगुरु मधुच्छन्दाको जब यह बात मालूम हुई कि 'राजा अग्निमें प्रवेश कर गये, मेरी पतिव्रता पत्नी मरकर फिर जी उठी और उसीके लिये महाराजने अपने जीवनका परित्याग किया है,' तब उनका ध्यान अपने कर्तव्यकी ओर गया। उन्होंने सोचा—'मैं भी अग्निमें प्रवेश करके अपने प्रिय मित्रके पास जाऊँ अथवा यहीं रहकर तपस्या करूँ?' अन्तमें वे इस निश्चयपर पहुँचे कि 'मेरा कर्तव्य तथा पुण्यकार्य यही है कि पहले राजाको जीवित करूँ, उसके बाद प्रियाके पास जाऊँ।' यह विचारकर उन्होंने सूर्यदेवका स्तवन किया, क्योंकि उनके सिवा दूसरा कोई सम्पूर्ण अभीष्ट वस्तुओंको देनेवाला नहीं है।