भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

Brahma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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* संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *


हैं। उनके वृत्तान्तका स्मरण, पठन अथवा भक्तिपूर्वक श्रवण भी मनुष्योंकी समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाला और भोग एवं मोक्षको देनेवाला है। मुने! कुशार्पणतीर्थ काशीसे भी उत्तम है। चराचर जगत्में इसके समान दूसरा कोई भी तीर्थ नहीं है। इसके स्मरणमात्रसे ब्रह्महत्या आदि पापोंका नाश हो जाता है। नारद! यह तीर्थ इस पृथ्वीपर स्वर्गका द्वार बताया जाता है।


सारस्वत तथा चिच्चिकतीर्थका माहात्म्य

ब्रह्माजी कहते हैं— सारस्वत नामक तीर्थ समस्त अभीष्ट वस्तुओंके साथ भोग और मोक्षको भी देनेवाला है। वह मनुष्योंके सब पापोंका नाशक, समस्त रोगोंको दूर करनेवाला और सम्पूर्ण सिद्धियोंका दाता है। नारद! उसके माहात्म्यका वृत्तान्त विस्तारपूर्वक सुनो। पुष्योत्कटसे पूर्व और गौतमीके दक्षिणतटपर एक विश्वविख्यात पर्वत है, जिसे शुभ्रगिरि कहते हैं। शाकल्य नामसे प्रसिद्ध एक परम निष्ठावान् मुनि उस पुण्यमय शुभ्र पर्वतपर उत्तम तपस्या कर रहे थे। गौतमीके तटपर रहकर तपस्या करनेवाले उन श्रेष्ठ ब्राह्मणको सभी भूतगण प्रतिदिन प्रणाम और उनका स्तवन किया करते थे। ऋषियों, गन्धर्वों तथा देवताओंसे सेवित उस परमपवित्र पर्वतपर देवताओं और ब्राह्मणोंको भय पहुँचानेवाला परशु नामक एक राक्षस रहता था। वह यज्ञसे द्वेष रखता, ब्राह्मणोंकी हत्या करता और इच्छानुसार अनेक रूप धारण करके वनमें विचरता रहता था। जहाँ विद्वान् ब्राह्मण शाकल्यमुनि रहते थे, वहाँ भी वह महापापी राक्षस आया करता था। विप्रवर शाकल्य बड़े तेजस्वी थे। पापाचारी परशु प्रतिदिन उन्हें उठा ले जाने अथवा मार डालनेकी चेष्टामें लगा रहता था, किंतु वह अपने उद्योगमें सफल न हो सका।

एक दिन द्विजश्रेष्ठ शाकल्य देवताओंकी पूजा करके भोजन करनेकी इच्छासे आश्रमपर आये। इसी समय परशु ब्राह्मणका रूप धारण करके किसी कन्याको साथ लिये वहाँ आया। उसका शरीर शिथिल हो गया था, सिरके बाल पक गये थे और वह अत्यन्त दुर्बल दिखायी देता था। उसने शाकल्यसे कहा—'ब्रह्मन्! आप मुझे और इस कन्याको भोजनार्थी जानिये। मानद! हमलोग आतिथ्यके समयपर आये हैं। आप कृतकृत्य हो गये। इस संसारमें वे ही धन्य हैं, जिनके घरसे अतिथि अपनी अभिलाषाको पूर्ण करके निकलते हैं। जो अतिथि-सत्कार नहीं करते, वे जीते हुए भी मृतकके समान हैं। जो भोजनके लिये बैठकर भी अपने लिये बने हुए