संक्षिप्त ब्रह्मपुराण
Brahma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| * भद्रतीर्थ, पतत्रितीर्थ और विप्रतीर्थकी महिमा * | २५५ |
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राजन्! मैं तुम्हारे प्रसादसे भगवान्का दर्शन करते ही स्वर्गलोकको चला जाऊँगा।'
पक्षीके यों कहनेपर राजा पवमानने उसे उठा लिया और ले जाकर उसे गौतमी गङ्गा तथा भगवान् गदाधरका दर्शन कराया। चिच्चिकने स्नान करके त्रैलोक्यपावनी गङ्गासे कहा—'माता गौतमी! तुम तीनों लोकोंको पवित्र करनेवाली हो। मनुष्य जबतक तुम्हारा दर्शन नहीं करता, तभीतक इस लोक और परलोकमें पातकी कहलाता है। यद्यपि मैंने सब प्रकारके पाप किये हैं तो भी अब तुम्हारी शरणमें आया हूँ। मेरा उद्धार करो। तुम भगवान् विष्णुके चरणकमलोंसे निकली हो। संसारके प्राणियोंकी तुम्हारे सिवा कहीं कोई भी गति नहीं है।'
पक्षीका अन्तःकरण श्रद्धासे शुद्ध हो गया था। उसने एकमात्र गङ्गाकी शरण ली और 'गङ्गे! मेरी रक्षा करो' इस प्रकार कहते हुए स्नान किया। तदनन्तर भगवान् गदाधरको प्रणाम करके राजा पवमानसे विदा ले पर्वतनिवासियोंके देखते-देखते वह स्वर्गमें चला गया। पवमान भी अपनी सेनाके साथ अपने नगरको लौट गये। तबसे वेदवेत्ता विद्वानोंने उस तीर्थका नाम पावमानतीर्थ, चिच्चिकतीर्थ और गदाधरतीर्थ रख दिया। उस तीर्थमें किया हुआ पुण्यकर्म कोटि-कोटिगुना हो जाता है।
भद्रतीर्थ, पतत्रितीर्थ और विप्रतीर्थकी महिमा
ब्रह्माजी कहते हैं— भद्रतीर्थ सब प्रकारके अनिष्टोंका निवारण करनेवाला है। वह समस्त पापोंका नाशक तथा परम शान्तिदायक है। विश्वकर्माकी पुत्री उषा भगवान् सूर्यकी पतिव्रता एवं प्रिया भार्या हैं। छाया भी उनकी ही भार्या हैं। छायाके पुत्र शनैश्चर हैं। शनैश्चरकी बहिन विष्टि हुई। उसकी आकृति भयानक थी। वह पापमयी थी। भगवान् सूर्यने सोचा—'यह कन्या किसको दूँ?' वे जिस-जिसको कन्या देना चाहते, वही-वही उसकी भयंकरताका समाचार सुनकर उसे लेना अस्वीकार कर देता और कहता—'ऐसी भार्या लेकर हम क्या करेंगे।' ऐसी अवस्थामें विष्टिने दुःखी होकर अपने पितासे कहा—'पिताजी! धनवान्, विद्वान्, तरुण, कुलीन, यशस्वी, उदार और सनाथ वरको कन्या देनी चाहिये।^१ जो पिता इसके विपरीत आचरण करता है, वह नरकमें पड़ता है। सूर्यदेव! कन्या विद्वानोंके लिये भी धर्मका साधन है। एक ओर पर्वत, वन और काननोंसहित समूची पृथ्वी और दूसरी ओर वस्त्राभूषणोंसे अलंकृत नीरोग कन्या—दोनों एक समान हैं। उस कन्याके दानसे पृथ्वीदानका फल होता है। जो कन्या, अश्व, गौ और तिलकी बिक्री करता है, उसका रौरव आदि नरकोंसे कभी छुटकारा नहीं होता। कन्याके विवाहमें कभी विलम्ब नहीं करना चाहिये। उसमें विलम्ब करनेपर पिताको जो पाप होता है, उसका वर्णन कौन कर सकता है।^२ कन्याके पिता जो उसके लिये दान-पूजन आदि करते हैं, वही सफल
१- श्रीमते विदुषे यूने कुलीनाय यशस्विने। उदाराय सनाथाय कन्या देया वराय वै॥
(१६५।८)
२- एकतः पृथिवी कृत्स्ना सशैलवनकानना।
स्वलंकृतोपाधिहीना सुकन्या चैकतः स्मृता। विक्रीणीते यश्च कन्यामश्वं वा गां तिलान्यपि॥