संक्षिप्त ब्रह्मपुराण
Brahma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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* संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *
उनकी महिमाका यथावत् वर्णन कोई नहीं कर सकता। सब लोग भक्तिसे सदा उनकी वन्दना करते हैं। वे वस्तुतः साक्षात् ब्रह्म हैं। नारद! मुझे तो यही सबसे बढ़कर आश्चर्यकी बात जान पड़ती है कि मेरी वाणीमें गङ्गाके गुणोंका वर्णन सुनकर भी तीनों लोकोंमें रहनेवाले सब प्राणियोंकी बुद्धि उन्हींकी ओर क्यों नहीं लग जाती।
नारदजीने कहा— भगवन्! आप धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्षके ज्ञाता और उपदेशक हैं। आपके वचनोंमें रहस्योंसहित छन्द (वेद), पुराण, स्मृति और धर्मशास्त्र आदि समस्त वाङ्मय प्रतिष्ठित है। अतः आप बताइये—तीर्थ, दान, यज्ञ, तप, देव-पूजन, मन्त्र-जप और सेवामें सबसे श्रेष्ठ क्या है? भगवन्! आप जैसा कहेंगे, वैसा ही होगा। उसके विपरीत कोई बात नहीं हो सकती। अतः मेरे इस संशयका निवारण कीजिये।
ब्रह्माजी बोले— नारद! सुनो, मैं रहस्यमय उत्तम धर्मका वर्णन करता हूँ। चार प्रकारके तीर्थ हैं। चार ही युग हैं। तीन गुण, तीन पुरुष और तीन ही सनातन देवता हैं। स्मृतियोंसहित वेद चार बताये गये हैं। पुरुषार्थ भी चार ही हैं और वाणीके भी चार ही भेद हैं। ये सब समान हैं। धर्म सर्वत्र एक ही है। क्योंकि वह सनातन है। साध्य और साधनके भेदसे उसके अनेक रूप माने गये हैं। धर्मके दो आश्रय हैं—देश और काल। कालके आश्रित जो धर्म है, वह सदा घटता-बढ़ता रहता है। युगोंके अनुसार उसमें एक-एक चरणकी न्यूनता होती जाती है। कालाश्रित धर्म भी देशमें सदा प्रतिष्ठित रहता है। युगोंका क्षय होनेपर भी देशाश्रित धर्मकी हानि नहीं होती। जो धर्म दोनों आश्रयोंसे हीन है, उसका अभाव हो जाता है। अतः देशके आश्रित रहनेवाला धर्म अपने चारों चरणोंके साथ प्रतिष्ठित होता है। देशाश्रित धर्म भिन्न-भिन्न देशोंमें तीर्थरूपसे स्थित रहता है। सत्ययुगमें धर्म देश और काल दोनोंके आश्रित होता है। त्रेतामें उसके एक चरणकी, द्वापरमें दो चरणोंकी और कलियुगमें उसके तीन चरणोंकी हानि होती है। द्वापर और कलिमें क्रमशः आधे और चौथाई रूपमें शेष रहकर धर्म चालू रहता है। कलिमें उसकी संकटमयी स्थिति होती है। जो इस प्रकार धर्मको जानता है, उसके धर्मकी हानि नहीं होती।
जो घरसे तीर्थयात्राके लिये निकलना चाहता है, उसके सामने अनेक प्रकारके विघ्न आते हैं; परंतु जो उन विघ्नोंके मस्तकपर पैर रखकर गङ्गाजीके पास नहीं पहुँचता, उसने अपने जीवनमें क्या फल पाया। गौतमीके प्रभावका कौन वर्णन कर सकता है। साक्षात् सदाशिव भी उसके वर्णनमें असमर्थ हैं। मैंने संक्षेपसे इतिहाससहित गङ्गाके माहात्म्यका प्रतिपादन किया है। चराचर जगत्में धर्म, अर्थ, काम और मोक्षका जो भी साधन है, वह सब इस विस्तृत इतिहासमें मौजूद है। इसमें वेदोक्त श्रुतियोंका सम्पूर्ण रहस्य बताया गया है। जगत्के कल्याणके लिये जो उत्तम साधन, जो उत्तम नामवाला प्राचीन तीर्थ देखा गया है, उसीका वर्णन किया गया है। जो इस माहात्म्यका एक श्लोक अथवा एक पद भी भक्तिपूर्वक पढ़ता और सुनता है अथवा 'गङ्गा-गङ्गा' यों उच्चारण करता है, वह पुण्यका भागी होता है। गङ्गाका यह उत्तम माहात्म्य कलिके कलङ्कका विनाश करनेवाला, सब प्रकारकी सिद्धि और मङ्गल देनेवाला है। संसारमें यह समादरके योग्य है। इसके पढ़ने और सुननेसे मनोवाञ्छित फलकी प्राप्ति होती है। जो सौ योजन दूरसे भी 'गङ्गा-गङ्गा' का उच्चारण करता है, वह सब पापोंसे मुक्त होता और भगवान् विष्णुके धाममें जाता है। तीनों लोकोंमें साढ़े तीन