संक्षिप्त ब्रह्मपुराण
Brahma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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श्रीकृष्ण तीनों लोकोंके स्वामी तथा सम्पूर्ण अभीष्ट वस्तुओंके दाता हैं। जो सदा उनका ध्यान करते हैं, वे निश्चय ही मुक्त हो जाते हैं। जो सदा श्रीकृष्णमें अनुरक्त रहते हैं, रातको सोते समय श्रीकृष्णका चिन्तन करते हैं और फिर सोकर उठनेके बाद श्रीकृष्णका स्मरण करते हैं, वे शरीर त्यागनेके बाद श्रीकृष्णमें ही प्रवेश करते हैं—ठीक वैसे ही जैसे मन्त्रोच्चारणपूर्वक होम किया हुआ हविष्य अग्निमें लीन हो जाता है।१ अतः मुनिवरो! मोक्षकी इच्छा रखनेवाले पुरुषोंको पुरुषोत्तमक्षेत्रमें सदा यत्नपूर्वक कमलनयन श्रीकृष्णका दर्शन करना चाहिये। जो मनीषी पुरुष शयन और जागरणकालमें श्रीकृष्ण, बलभद्र तथा सुभद्राका दर्शन करते हैं, वे श्रीहरिके धाममें जाते हैं। जो हर समय भक्तिपूर्वक पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण, रोहिणीनन्दन बलभद्र और सुभद्रादेवीका दर्शन करते हैं, वे भगवान् विष्णुके लोकमें जाते हैं। जो वर्षाके चार महीनोंमें पुरुषोत्तमक्षेत्रके भीतर निवास करते हैं, उन्हें सारी पृथ्वीकी तीर्थयात्रासे भी अधिक फल प्राप्त होता है। जो इन्द्रियोंको जीतकर और क्रोधको वशीभूत करके सदा पुरुषोत्तमक्षेत्रमें ही निवास करते हैं, वे तपस्याका फल पाते हैं। मनुष्य अन्य तीर्थोंमें दस हजार वर्षोंतक तपस्या करके जो फल पाता है, उसे पुरुषोत्तमक्षेत्रमें एक ही मासमें प्राप्त कर लेता है। तपस्या, ब्रह्मचर्यपालन तथा आसक्ति-त्यागसे जो फल मिलता है, उसे मनीषी पुरुष वहाँ सदा ही पाते रहते हैं। सब तीर्थोंमें स्नान-दान करनेका जो पुण्य फल बताया गया है, वह मनीषी पुरुषोंको यहाँ सर्वदा प्राप्त होता है। विधिपूर्वक तीर्थसेवन तथा व्रत और नियमोंके पालनसे जो फल बताया गया है, उसे वहाँ इन्द्रियसंयमपूर्वक पवित्रतासे रहनेवाला पुरुष प्रतिदिन प्राप्त करता है। नाना प्रकारके यज्ञोंसे मनुष्य जो फल प्राप्त करता है, वह जितेन्द्रिय पुरुषको वहाँ प्रतिदिन मिला करता है। जो पुरुषोत्तमक्षेत्रमें कल्पवृक्ष (अक्षयवट)-के पास जाकर शरीरत्याग करते हैं, वे निःसंदेह मुक्त हो जाते हैं। जो मानव बिना इच्छाके भी वहाँ प्राणत्याग करता है, वह भी दुःखसे मुक्त हो दुर्लभ मोक्ष प्राप्त कर लेता है। कृमि, कीट, पतङ्ग आदि तथा पशु-पक्षियोंकी योनिमें पड़े हुए जीव भी वहाँ देहत्याग करनेपर परमगतिको प्राप्त करते हैं। जो मनुष्य एक बार भी श्रद्धापूर्वक भगवान् पुरुषोत्तमका दर्शन कर लेता है, वह सहस्रों पुरुषोंमें उत्तम है। भगवान् प्रकृतिसे परे और पुरुषसे भी उत्तम हैं। इसलिये वे वेद, पुराण तथा इस लोकमें पुरुषोत्तम कहलाते हैं। जो पुराण और वेदान्तमें परमात्मा कहे गये हैं, वे ही सम्पूर्ण जगत्का उपकार करनेके लिये पुरुषोत्तमरूपसे विराजमान हैं।२ पुरुषोत्तमक्षेत्रके भीतर मार्गमें, श्मशानभूमिमें, घरके मण्डपमें, सड़कों और गलियोंमें—जहाँ कहीं इच्छा या अनिच्छासे भी शरीरत्याग करनेवाला मनुष्य मोक्षका भागी होता है। पुरुषोत्तमतीर्थके समान किसी तीर्थका माहात्म्य न हुआ है और न होगा। मैंने उस क्षेत्रके गुणोंका एक अंशमात्र यहाँ बताया है। कौन पुरुष सौ वर्षोंमें भी उसके समस्त गुणोंका
१. कृष्णे रताः कृष्णमनुस्मरन्ति रात्रौ च कृष्णं पुनरुत्थिता ये।
ते भिन्नदेहाः प्रविशन्ति कृष्णं हविर्यथा मन्त्रहुतं हुताशम्॥ (१७७।५)
२. प्रकृतेः स परो यस्मात् पुरुषादपि चोत्तमः। तस्माद् वेदे पुराणे च लोकेऽस्मिन् पुरुषोत्तमः॥
योऽसौ पुराणे वेदान्ते परमात्मेत्युदाहृतः। आस्ते विश्वोपकाराय तेनासौ पुरुषोत्तमः॥
(१७७।२२-२३)