संक्षिप्त ब्रह्मपुराण
Brahma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- इन्द्रके द्वारा भगवान्का अभिषेक, रासलीला और अरिष्टासुरका वध * ३०१
श्रीकृष्णका अभिषेक होते समय गौओंने तत्काल अपने थनोंसे दूधकी धारा बहाकर वसुधाको भिगो दिया। अभिषेकका कार्य पूरा करके शचीपति इन्द्रने प्रेम और विनयपूर्वक श्रीकृष्णसे फिर कहा—'महाभाग! यह सब तो मैंने गौओंके आदेशसे किया है। अब पृथ्वीका भार उतरवानेकी इच्छासे मैं जो और कुछ बातें निवेदन करता हूँ, उन्हें भी सुनिये। मेरे अंशसे इस पृथ्वीपर एक श्रेष्ठ पुरुष उत्पन्न हुआ है, जिसका नाम अर्जुन है। आप उसकी सदा रक्षा करते रहें। मधुसूदन! अर्जुन वीर पुरुष है। वह इस भूमिक भार उतारनेमें आपकी सहायता करेगा। जैसे अपनी रक्षा की जाती है, वैसे ही आपको अर्जुनकी भी रक्षा करनी चाहिये।'
**श्रीभगवान् बोले—**देवराज ! मैं जानता हूँ, भरतवंशमें आपके अंशसे अर्जुनकी उत्पत्ति हुई है। मैं जबतक इस भूतलपर रहूँगा, अर्जुनकी रक्षा करूँगा। मेरे रहते अर्जुनको युद्धमें कोई भी जीत न सकेगा। महाबाहु कंस, अरिष्टासुर, केशी, कुवलयापीड और नरकासुर आदि दैत्योंके मारे जानेके पश्चात् महाभारत युद्ध होगा। उसकी समाप्ति होनेपर यह जानना चाहिये कि पृथ्वीका भार उतर गया। अब आप जाइये, पुत्रके लिये चिन्ता न कीजिये। मेरे आगे अर्जुनका कोई भी शत्रु सफल न हो सकेगा। केवल अर्जुनके लिये ही मैं युधिष्ठिर आदि पाँचों भाइयोंको महाभारतके अन्तमें कुन्तीदेवीके समीप सकुशल लौटाऊँगा।
श्रीकृष्णके यों कहनेपर देवराज इन्द्रने उन्हें छातीसे लगाया और ऐरावतपर आरूढ़ हो पुनः स्वर्गको प्रस्थान किया। तदनन्तर श्रीकृष्ण गौओं और ग्वाल-बालोंके साथ पुनः ब्रजमें लौट आये। गोपियोंकी आँखें उनके पथपर लगी हुई थीं। उनकी दृष्टिसे वह मार्ग पवित्र हो गया था।
इन्द्रके चले जानेपर गोपोंने अनायास ही अद्भुत कर्म करनेवाले श्रीकृष्णसे प्रेमपूर्वक कहा—'महाभाग ! आपने गोवर्धन पर्वत उठाकर हमारी और गौओंकी बहुत बड़े भयसे रक्षा की है। तात! यह अनुपम बाललीला, समाजमें नीचा समझा जानेवाला ग्वालेका शरीर और आपका दिव्य कर्म—यह सब क्या है? आपने जलमें प्रवेश करके कालिय नागका दमन किया, प्रलम्बको मार गिराया और गोवर्धन पर्वतको हाथपर उठा लिया। इससे हमारे मनमें सन्देह पैदा होता है। अमितपराक्रम श्रीकृष्ण! हम श्रीहरिके चरणोंकी शपथ खाकर सत्य-सत्य कहते हैं कि आपकी इस दिव्य शक्तिको देखते हुए हमें विश्वास नहीं होता कि आप मनुष्य हैं। आप देवता हैं या दानव, यक्ष हैं या गन्धर्व—इन सब बातोंका विचार करनेसे हमारा क्या लाभ है। आप कोई भी क्यों न हों, इस समय हमारे बान्धव हैं। अतः आपको नमस्कार है। हम देखते हैं, स्त्री और बालकोंसहित समस्त ब्रजका आपके प्रति प्रेम बढ़ रहा है और यह कर्म भी आपका ऐसा है, जिसे सम्पूर्ण देवता भी नहीं कर सकते। अभी आप बालक हैं, फिर भी आपके बलकी कोई सीमा नहीं है। इधर आपने हमलोगोंमें जन्म लिया है, जो अच्छी श्रेणीमें नहीं गिना जाता। अमेयात्मन्! इन सब बातोंपर विचार करनेसे आप हमारे मनमें शङ्का उत्पन्न कर देते हैं।'
गोपोंकी यह बात सुनकर भगवान् कुछ कालतक प्रेमसे रूठकर चुपचाप बैठे रहे। फिर इस प्रकार बोले—'गोपगण! यदि मेरे साथ सम्बन्ध होनेसे आपको लज्जा नहीं आती हो अथवा यदि मैं आपलोगोंका प्रिय हूँ तो इस प्रकार विचार करनेकी क्या आवश्यकता है। यदि मुझपर आपका प्रेम है अथवा मैं आपकी प्रशंसाका पात्र हूँ तो मेरे प्रति