संक्षिप्त ब्रह्मपुराण
Brahma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- इन्द्रके द्वारा भगवान्का अभिषेक, रासलीला और अरिष्टासुरका वध * ३०३
अत्यन्त हर्षसे भर गयी। उसके नेत्र प्रसन्नतासे खिल उठे और वह 'कृष्ण-कृष्ण-कृष्ण' की रट लगाने लगी। किसीने भौंहें टेढ़ी करके उनकी ओर देखा और नेत्ररूपी भ्रमरोंके द्वारा उनके मुखकमलकी सौन्दर्य-माधुरीका पान करने लगी। किसी गोपीने गोविन्दको निहारकर अपने नेत्र बंद कर लिये और उन्हींके रूपका ध्यान करती हुई वह योगारूढ़-सी प्रतीत होने लगी।
तब माधवने किसीको प्रिय वचन कहकर और किसीको कुटिल भ्रूभङ्गीसे निहारकर मनाया। सबका चित्त प्रसन्न हो गया। फिर उदार चरित्रोंवाले श्रीकृष्णने रासमण्डली बनायी और समस्त गोपियोंके साथ आदरपूर्वक रासलीला की। उस समय कोई भी गोपी श्रीकृष्णके पाससे हटना नहीं चाहती थी, अतः एक स्थानपर स्थिर हो जानेके कारण रासोचित मण्डल न बन सका। तब श्रीकृष्णने एक-एक गोपीका हाथ पकड़कर रासमण्डलकी रचना की। उस समय उनके हाथका स्पर्श पाकर प्रत्येक गोपीकी आँखें आनन्दसे मुँद जाती थीं। इसके बाद रासलीला आरम्भ हुई। चञ्चल चूड़ियोंकी झनकारके साथ क्रमशः शरद्-ऋतुकी शोभाके रमणीय गीत गाये जाने लगे। उस समय श्रीकृष्ण शरद्-ऋतुके चन्द्रमाका, उनकी चारु-चन्द्रिकाका और मनोहर कुमुद-वनका वर्णन करते हुए गीत गाते थे; किंतु गोपियाँ बारंबार केवल श्रीकृष्णके नामका ही गान करती थीं। श्रीकृष्ण जितने ऊँचे स्वरसे रासके गीत गाते, उससे दुगुने स्वरमें समस्त गोपियाँ 'धन्य कृष्ण ! धन्य कृष्ण!!' का उच्चारण करती थीं। भगवान् जब आगे चलते, तब गोपियाँ उनके पीछे चलती थीं और जब वे पीछेकी ओर घूमकर लौट पड़ते, तब वे उनके सामने मुँह किये पीछे हटती थीं। इस प्रकार वे अनुलोम और प्रतिलोम-गतिसे श्रीहरिका साथ देती थीं। मधुसूदनने उस समय गोपियोंके साथ ऐसा रास किया, जिससे उन्हें उनके बिना एक क्षण भी करोड़ वर्षोंके समान प्रतीत होने लगा। भगवान् श्रीकृष्ण सबके ईश्वर हैं। वे गोपियोंमें, उनके पतियोंमें तथा सम्पूर्ण भूतोंमें भी निवास करते हैं। वे आत्मारूपसे सम्पूर्ण विश्वको व्याप्त करके स्थित हैं। जैसे सब प्राणियोंमें पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश और आत्मा हैं, उसी प्रकार भगवान् भी सबको व्याप्त करके स्थित हैं।
एक दिन आधी रातके समय जब श्रीकृष्ण रासलीलामें संलग्न थे, अरिष्टासुर नामका उन्मत्त दानव व्रजवासियोंको त्रास देता हुआ वहाँ साँड़के रूपमें आ पहुँचा। उसका शरीर जलपूर्ण मेघके समान काला था। सींग तीखे थे। नेत्र सूर्यकी भाँति तेजस्वी दिखायी देते थे। वह अपने खुरोंके अग्रभागसे पृथ्वीको विदीर्ण किये डालता था और दाँत पीसता हुआ अपने दोनों ओठोंको बार-बार जीभसे चाटता था। उसके कंधोंकी गाँठें अत्यन्त कठोर थीं और उसने क्रोधके मारे अपनी पूँछ ऊपर उठा रखी थी। उसकी गर्दन लंबी और मुख विशाल था। वृक्षोंसे टक्कर लेनेके कारण उसके ललाटमें घावके कई चिह्न थे। साँड़का रूप धारण करनेवाला वह दैत्य गौओंके गर्भ गिरा देता और सबको बड़े वेगसे मारता हुआ सदा वनमें घूमा करता था। उसके नेत्र बड़े भयंकर थे। उसे देखकर समस्त गोप और गोपाङ्गनाएँ अत्यन्त भयसे व्याकुल हो उठीं और 'कृष्ण-कृष्ण' पुकारने लगीं। उनका आर्तनाद सुनकर श्रीकृष्णने ताल ठोंकते हुए सिंहके समान गर्जना की। वह शब्द सुनकर दुरात्मा वृषाभासुर श्रीकृष्णकी ओर ही दौड़ा। उसकी आँखें श्रीकृष्णके पेटकी ओर लगी थीं और सामने उन्हींकी सीधमें उसने सींगोंका अग्रभाग कर रखा था। उस महाबली