संक्षिप्त ब्रह्मपुराण
Brahma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें* चन्द्रवंशके अन्तर्गत जह्नु, कुशिक तथा भृगुवंशका संक्षिप्त वर्णन * २९
चार पुत्र हुए—कुशिक, कुशनाभ, कुशाम्ब और मूर्तिमान्। राजा कुशिक वनमें रहकर ग्वालोंके साथ पले थे। उन्होंने इन्द्रके समान पुत्र प्राप्त करनेकी इच्छासे तप किया। एक हजार वर्ष पूर्ण होनेपर इन्द्र भयभीत होकर उनके पास आये। उन्होंने स्वयं अपनेको ही उनके पुत्ररूपमें प्रकट किया। उस समय वे राजा गाधिके नामसे प्रसिद्ध हुए। कुशिककी पत्नी पौरा थी। उसीके गर्भसे गाधिका जन्म हुआ था। गाधिके एक परम सौभाग्यशालिनी कन्या हुई, जिसका नाम सत्यवती था। गाधिने उस कन्याका विवाह शुक्राचार्यके पुत्र ऋचीकके साथ किया था। ऋचीक अपनी पत्नीसे बहुत प्रसन्न रहते थे। उन्होंने अपने तथा राजा गाधिके पुत्र होनेके लिये पृथक्-पृथक् चरु तैयार किये और अपनी पत्नीको बुलाकर कहा—'शुभे! इस चरुका उपयोग तुम करना और इसका उपयोग अपनी मातासे कराना। तुम्हारी माताको जो पुत्र होगा, वह तेजस्वी क्षत्रिय होगा। लोकमें दूसरे क्षत्रिय उसे जीत नहीं सकेंगे। वह बड़े-बड़े क्षत्रियोंका संहार करनेवाला होगा तथा तुम्हारे लिये जो चरु
है, वह तुम्हारे पुत्रको धीर, तपस्वी, शान्तिपरायण एवं श्रेष्ठ ब्राह्मण बनायेगा।' अपनी पत्नीसे यों कहकर भृगुनन्दन ऋचीक घने जंगलमें चले गये और वहाँ प्रतिदिन तपस्यामें संलग्न रहने लगे। उस समय राजा गाधि अपनी स्त्रीके साथ तीर्थयात्राके प्रसङ्गमें घूमते हुए ऋचीक मुनिके आश्रमपर अपनी पुत्रीसे मिलनेके लिये आये थे। सत्यवतीने दोनों चरु ऋषिसे ले लिये थे। उसने उन्हें हाथमें लेकर अपनी माताको निवेदन किया। उसकी माताने दैववश अपना चरु पुत्रीको दे दिया और उसका चरु स्वयं ग्रहण कर लिया।
तदनन्तर सत्यवतीने समस्त क्षत्रियोंका विनाश करनेवाला गर्भ धारण किया। उसका शरीर अत्यन्त उद्दीप्त हो रहा था। देखनेमें वह बड़ी भयङ्कर जान पड़ती थी। ऋचीकने उसे देखकर योगके द्वारा सब कुछ जान लिया और उससे कहा—'भद्रे! तुम्हारी माताने चरु बदलकर तुम्हें ठग लिया। तुम्हारा पुत्र कठोर कर्म करनेवाला और अत्यन्त दारुण होगा तथा तुम्हारा भाई ब्रह्मभूत तपस्वी होगा; क्योंकि मैंने तपस्यासे सर्वरूप ब्रह्मका भाव उसमें स्थापित किया था। तब सत्यवतीने अपने पतिको प्रसन्न करते हुए कहा—'मुने! मेरा पुत्र ऐसा न हो; आप-जैसे महर्षिसे ब्राह्मणाधमकी उत्पत्ति हो, यह मैं नहीं चाहती।' यह सुनकर मुनि बोले—'भद्रे! मेरा पुत्र ऐसा हो, यह संकल्प मैंने नहीं किया है; तथापि पिता और माताके कारण पुत्र कठोर कर्म करनेवाला हो सकता है।' उनके यों कहनेपर सत्यवती बोली—'मुने! आप चाहें तो नूतन लोकोंकी भी सृष्टि कर सकते हैं। फिर योग्य पुत्र उत्पन्न करना कौन बड़ी बात है। आप मुझे शान्तिपरायण कोमल स्वभाववाला पुत्र देनेकी कृपा करें। यदि चरुका प्रभाव अन्यथा न