संक्षिप्त ब्रह्मपुराण
Brahma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- अक्रूरका नन्दगाँवमें जाना, श्रीराम-कृष्णकी मथुरायात्रा * ३०९
होते हुए भी दोषके पात्र बने हुए मुझ अक्रूरका क्या आदर न करेंगे? जो साधु पुरुषोंसे बहिष्कृत है उसके जन्मको धिक्कार है। भगवान् श्रीहरि ज्ञानस्वरूप हैं। परिपूर्ण सत्त्वके पुञ्ज हैं। सब प्रकारके दोषोंसे रहित हैं, अव्यक्त हैं और समस्त प्राणियोंके हृदयमें विराजमान हैं। जगत्में कौन-सी ऐसी वस्तु है, जो उन्हें ज्ञात न हो। अतः मैं भक्तिसे विनीत होकर आदि, मध्य और अन्तसे रहित, अजन्मा, पुरुषोत्तम, भगवान् विष्णुके अंशावतार तथा ईश्वरोंके भी ईश्वर श्रीकृष्णकी शरणमें जाता हूँ।'
इस प्रकार विचार करते हुए वे भगवान् श्रीकृष्णके पास गये और 'मैं यदुवंशी अक्रूर हूँ'—यों कहकर उनके चरणोंमें पड़ गये। भगवान्ने भी ध्वजा, वज्र और कमल आदि चिह्नोंसे सुशोभित अपने करकमलद्वारा उनका स्पर्श किया और उन्हें खींचकर प्रेमपूर्वक गाढ़ आलिङ्गन दिया। फिर बलराम और श्रीकृष्णने उनसे बातचीत की और उन्हें साथ ले अपने भवनमें चले गये। परस्पर प्रणाम आदिके बाद अक्रूरने दोनों भाइयोंके साथ बैठकर भोजन किया और यथायोग्य उनसे सब बातें निवेदन कीं। दुरात्मा दानव कंसने वसुदेव और देवकीको जिस प्रकार धमकाया था, उग्रसेनके प्रति जैसा उसका बर्ताव था और जिस उद्देश्यसे कंसने उन्हें व्रजमें भेजा था, वह सब विस्तारके साथ कह सुनाया। सुनकर भगवान् श्रीकृष्णने कहा—'ये सब बातें मुझे ज्ञात हैं। इस विषयमें जो उचित कर्तव्य है, उसे मैं करूँगा। आप अन्यथा विचार न करें। कंसको मारा गया ही समझें। मैं बलरामजीसहित कल आपके साथ मथुरा चलूँगा। बड़े-बूढ़े गोप भी भेंटकी बहुत-सी सामग्री लेकर जायँगे। वीर! आप किसी प्रकारकी चिन्ता न करें। आरामसे यहाँ रात बितायें। आजसे तीन रातके भीतर ही मैं अनुचरोंसहित कंसको मार डालूँगा।'
तदनन्तर गोपोंको मथुरा चलनेका आदेश दे अक्रूर, श्रीकृष्ण तथा बलरामजी नन्दके घरमें सोये। सबेरा होनेपर महाबली राम और श्रीकृष्ण अक्रूरके साथ मथुरा जानेको तैयार हो गये, यह देख गोपियोंके नेत्रोंमें आँसू भर आये। वे चिन्तासे इतनी दुर्बल हो गयीं कि उनके कंगन और बाजूबंद खिसक-खिसककर गिरने लगे। वे दुःखसे पीड़ित हो लंबी साँस लेती हुई एक दूसरीसे कहने लगीं—'सखी! गोविन्द मथुरा जाते हैं। वहाँ जाकर वे इस गोकुलमें फिर क्यों आने लगे। वहाँ तो अपने कानोंद्वारा नगरकी स्त्रियोंके मधुर वार्तालापका रस पान करेंगे। नगरकी नारियोंके विलासपूर्ण वचनोंमें जब इनका मन आसक्त हो जायगा, तब फिर गाँवोंकी रहनेवाली इन गँवार गोप-गोपियोंकी ओर उनका झुकाव कैसे हो सकेगा। हाय ! श्रीहरि सम्पूर्ण व्रजके प्राण थे। इन्हें छीनकर दुरात्मा और निर्दयी विधाताने हम गोपियोंपर निष्ठुर प्रहार किया है। नगरकी युवतियाँ भावभरी मुसकानके साथ बात करती हैं। उनकी गतिमें लालित्य है। वे कटाक्षपूर्ण नेत्रोंसे देखती हैं। अतः ये हमलोगोंके पास क्यों आने लगे। यह देखो, गोविन्द रथपर बैठकर मथुरा जाते हैं। क्रूर अक्रूरने उन्हें चकमा दिया है। क्या इस निर्दयीको प्रेमीजनोंकी मानसिक वेदनाका अनुभव नहीं है, जो यह हमारे नयनानन्द गोविन्दको अन्यत्र लिये जाता है ? गोविन्द भी आज अत्यन्त निष्ठुर हो गये हैं। देखो न, बलरामजीके साथ रथपर बैठकर चले जा रहे हैं। अरी! इन्हें रोकनेमें शीघ्रता करो। ऐं! क्या कहती हो—गुरुजनोंके सामने हमारा कुछ बोलना उचित नहीं है ? अरी! हम तो यों ही विरहकी आगमें जल रही हैं। अब ये गुरुजन हमारा क्या कर लेंगे। हाय ! ये नन्दबाबा आदि