भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

Brahma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished434 पृष्ठ

पृष्ठ 321, कुल 434 में से

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* भगवान्‌की माता-पितासे भेंट तथा उग्रसेनका राज्याभिषेक * ३१९

अपने मरे हुए पुत्रको माँगा, जो प्रभासक्षेत्रमें समुद्रके भीतर डूब गया था। तब बलराम और श्रीकृष्ण हथियार लेकर समुद्रतटपर गये और समुद्रसे बोले—‘मेरे गुरुके पुत्रको ले आओ।’ समुद्रने हाथ जोड़कर कहा—‘भगवन्! मैंने सांदीपनिके पुत्रका अपहरण नहीं किया है। मेरे भीतर पञ्चजन नामका एक दैत्य रहता है, उसका आकार शङ्खका-सा है। उसीने उस बालकको पकड़ लिया था। वह दैत्य आज भी मेरे जलमें मौजूद है।’ समुद्रके यों कहनेपर भगवान्ने जलमें प्रवेश करके पञ्चजनको मार डाला और उसकी हड्डियोंका उत्तम शङ्ख ग्रहण किया। उसका शब्द सुनकर दैत्योंका बल क्षीण होता, देवताओंकी शक्ति बढ़ती और अधर्मका नाश होता है। तदनन्तर भगवान् श्रीकृष्ण और बलवान् बलरामजी यमपुरीमें गये; वहाँ उन्होंने शङ्ख-नाद किया और वैवस्वत यमको जीतकर गुरुके पुत्रको प्राप्त कर लिया। वह बेचारा वहाँ नरककी यातना भोग रहा था। उसे पहले-जैसा शरीर प्रदानकर दोनों भाइयोंने गुरुको अर्पित किया। तत्पश्चात् वे दोनों बन्धु उग्रसेनद्वारा पालित मथुरापुरीमें चले आये। उनके आगमनसे मथुराके सभी स्त्री-पुरुष प्रसन्न हो गये।

महाबली कंसने जरासंधकी पुत्री अस्ति और प्राप्तिसे विवाह किया था। जरासंध मगधदेशका बलवान् राजा था। वह बहुत बड़ी सेना साथ लेकर अपने दामादको मारनेवाले यदुवंशियोंसहित श्रीकृष्णका वध करनेके लिये क्रोधपूर्वक आया। मथुराके पास पहुँचकर उसने उस पुरीको चारों ओरसे घेर लिया। उसके साथ तेईस अक्षौहिणी सेना थी। बलराम और श्रीकृष्ण थोड़े-से सैनिकोंको साथ ले नगरसे बाहर निकले और उसके बलवान् योद्धाओंके साथ युद्ध करने लगे। उस समय उन्हें अपने पुरातन आयुधोंको ग्रहण करनेकी इच्छा हुई। उनके मनमें ऐसा संकल्प आते ही सुदर्शन चक्र, शार्ङ्गधनुष, बाणोंसे भरा हुआ अक्षय तूणीर और कौमोदकी गदा—ये सभी अस्त्र श्रीकृष्णके हाथमें आ गये। इसी प्रकार बलदेवजीके हाथमें भी उनके अभीष्ट अस्त्र हल और मुसल आ गये। उन दिव्य अस्त्रोंको पाकर श्रीकृष्ण और बलरामने महाराज जरासंधको सेनासहित युद्धमें परास्त कर दिया और फिर वे अपनी पुरीमें लौट आये। दुराचारी जरासंध परास्त होकर भी जीते-जी लौट गया था। अतः श्रीकृष्णने उसे हारा हुआ नहीं समझा। वह पुनः बहुत बड़ी सेनाके साथ मथुरापर चढ़ आया और बलराम तथा श्रीकृष्णसे परास्त होकर भाग खड़ा हुआ। इस प्रकार अत्यन्त दुर्मद मगधराजने श्रीकृष्ण आदि यदुवंशियोंके साथ अठारह बार लोहा लिया। परंतु प्रत्येक युद्धमें उसे यदुवंशियोंद्वारा मुँहकी खानी पड़ी। यद्यपि उसके पास सेना अधिक थी तो भी थोड़ी-सी सेनावाले यादवोंने उसे मार भगाया। इन अनेक युद्धोंमें लड़नेपर भी जो यदुवंशियोंकी सेना सुरक्षित रह गयी, यह चक्रपाणि भगवान् विष्णुके अंशभूत श्रीकृष्णके सामीप्यकी महिमा थी। भगवान् श्रीकृष्ण शत्रुओंपर जो अनेक प्रकारके अस्त्र चलाते थे, यह मनुष्यधर्मका पालन करनेवाले जगदीश्वरकी लीला थी। जो मनसे ही संसारकी सृष्टि और संहार करते हैं, उन्हें शत्रुपक्षका विनाश करनेमें कितने उद्यमकी आवश्यकता है; तथापि मनुष्योंके धर्मका अनुसरण करते हुए बलवानोंसे संधि और हीन बलवालोंके साथ युद्ध करते थे। कहीं साम, दान और कहीं भेदकी नीति दिखाते हुए कहीं-कहींपर दण्डनीतिका भी प्रयोग करते थे और आवश्यकता होनेपर कहीं युद्धसे पलायन भी करते थे। इस प्रकार वे मानव-शरीरकी चेष्टाका अनुसरण करते थे। वास्तवमें यह जगदीश्वरकी

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