संक्षिप्त ब्रह्मपुराण
Brahma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- भगवान्की माता-पितासे भेंट तथा उग्रसेनका राज्याभिषेक * ३२१
दैत्योंको परास्त किया। युद्ध समाप्त होनेपर उन्हें नींद सताने लगी। तब उन्होंने देवताओंसे दीर्घकालतक निद्रामें पड़े रहनेका वरदान माँगा। देवताओंने कहा—'राजन्! जो तुम्हें सोतेसे उठा देगा, वह तुम्हारे शरीरसे उत्पन्न हुई अग्निसे तत्क्षण जलकर भस्म हो जायगा।' इस प्रकार पापी कालयवनको भस्म करके राजाने मधुसूदनसे पूछा—'आप कौन हैं?' वे बोले—'मैं चन्द्रवंशके भीतर यदुकुलमें उत्पन्न वसुदेव-पुत्र श्रीकृष्ण हूँ।' यह सुनकर उन्होंने सर्वेश्वर श्रीहरिको प्रणाम करके कहा— 'भगवन्! मैंने आपको पहचान लिया। आप श्रीहरिके अंशभूत साक्षात् परमेश्वर हैं। पूर्वकालमें गार्ग्यने कहा था—अट्ठाईसवें द्वापरके अन्तमें यदुकुलमें श्रीहरिका अवतार होगा। वे अवतारधारी श्रीहरि आप ही हैं, इसमें तनिक भी संदेह नहीं है। आप मर्त्यलोकके प्राणियोंका उपकार करनेवाले हैं। आपके इस महान् तेजको मैं नहीं सह सकता। आपकी वाणी महामेघकी गंभीर गर्जनाके समान है। देवासुर-संग्राममें दैत्यपक्षके महान् योद्धा भी आपके जिस महान् तेजको सहन न कर सके, वही तेज आज मेरे लिये भी असह्य है। संसार-सागरमें पड़े हुए जीवके लिये एकमात्र आप ही परमाश्रय हैं, शरणागतोंकी पीड़ा दूर करनेवाले हैं। भगवन्! मुझपर प्रसन्न होइये और मेरे अमङ्गलको हर लीजिये। आप ही समुद्र, पर्वत, नदी, वन, पृथ्वी, आकाश, वायु, जल, अग्नि तथा पुरुष हैं। पुरुषसे भी परे जो व्यापक, जन्म आदि विकारोंसे रहित, शब्द आदिसे शून्य, सदा नवीन तथा वृद्धि और क्षयसे रहित तत्त्व है, वह भी आप ही हैं। देवता, पितर, यक्ष, गन्धर्व, राक्षस, सिद्ध, अप्सरा, मनुष्य, पशु-पक्षी, सर्प, मृग तथा वृक्ष—सब आपसे ही उत्पन्न हुए हैं। इस चराचर जगत्में जो कुछ भी भूत या भविष्य, मूर्त या अमूर्त अथवा स्थूल या सूक्ष्मतर वस्तु है, वह सब आपके सिवा कुछ भी नहीं है। भगवन्! इस संसारचक्रमें आध्यात्मिक आदि तीनों तापोंसे पीड़ित हो सदा भटकते हुए मुझे कभी शान्ति नहीं मिली। नाथ! मैंने मृगतृष्णासे जलकी आशा करके दुःखोंको ही सुख समझकर ग्रहण किया, अतः वे सदा मेरे लिये संतापके ही कारण हुए। प्रभो! राज्य, पृथ्वी, सेना, कोष, मित्र, पुत्र, पत्नी, भृत्य और शब्द आदि विषय—यह सब कुछ मैंने सुख-बुद्धिसे ग्रहण किया; परंतु देवेश्वर! परिणाममें ये सब मेरे लिये संतापप्रद ही सिद्ध हुए हैं। नाथ! देवलोककी उत्तम गतिको प्राप्त देवताओंको भी जब मुझसे सहायता लेनेकी इच्छा हुई, तब वहाँ भी नित्य शान्ति कहाँ है। आप सम्पूर्ण जगत्के उद्गम-स्थान हैं। परमेश्वर! आपकी आराधना किये बिना सनातन शान्ति कौन पा सकता है। जिनका चित्त आपकी मायासे मोहित है, वे जन्म-मृत्यु और जरा आदि कष्टोंको भोगकर अन्तमें यमराजका दर्शन करते हैं। तदनन्तर सैकड़ों पाशोंमें आबद्ध हो नरकोंमें अत्यन्त दारुण दुःख भोगते हैं। यह विश्व आपका स्वरूप है। परमेश्वर! मैं अत्यन्त विषयी हूँ और आपकी मायासे मोहित होकर ममताके अगाध गर्तमें भटक रहा हूँ। वही मैं आज अपार एवं स्तवन करने योग्य आप परमेश्वरकी शरणमें आया हूँ, जिससे भिन्न दूसरा कोई परम पद नहीं है। मेरा चित्त सांसारिक श्रमसे संतप्त है; अतः मैं निर्वाणस्वरूप आप परमधाम परमात्माकी अभिलाषा करता हूँ।
व्यासजी कहते हैं— परम बुद्धिमान् राजा मुचुकुन्दके इस प्रकार स्तुति करनेपर आदि-अन्तरहित, सर्वभूतेश्वर श्रीहरिने कहा—'नरेश्वर! तुम अपनी इच्छाके अनुसार दिव्य लोकोंमें जाओ और मेरे प्रसादसे उत्तम ऐश्वर्यसे सम्पन्न होकर वहाँके दिव्य भोग भोगो। तत्पश्चात् इस पृथ्वीपर