भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

Brahma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished434 पृष्ठ

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पृष्ठ 33
  • आयु और नहुषके वंशका वर्णन, रजि एवं ययातिका चरित्र * ३१

लेकर जिनके लिये युद्ध करेंगे, वे निःसंदेह तीनों लोकोंपर विजय प्राप्त कर सकते हैं। जिस पक्षमें रजि हैं, उधर ही धृति है। जहाँ धृति है, वहीं लक्ष्मी है तथा जहाँ धृति और लक्ष्मी हैं, वहीं धर्म एवं विजय है।

यह सुनकर देवता और दानव दोनोंका मन प्रसन्न हो गया। वे रजिके पास आकर बोले—‘राजन्! आप हमारी विजयके लिये श्रेष्ठ धनुष धारण कीजिये।’ तब रजिने स्वार्थको सामने रखकर अपने यशको प्रकाशमें लाते हुए उभय पक्षके लोगोंसे कहा—‘देवताओ! यदि मैं अपने पराक्रमसे समस्त दैत्योंको जीतकर धर्मतः इन्द्र बन सकूँ तो तुम्हारी ओरसे युद्ध करूँगा।’ देवताओंने इस शर्तको पहले ही प्रसन्नतापूर्वक मान लिया। वे बोले—‘राजन्! ऐसा ही करो। तुम्हारी मनः-कामना पूर्ण हो।’ देवताओंकी यह बात सुनकर राजा रजिने असुरोंसे भी वही बात पूछी। तब अहंकारी दानवोंने स्वार्थको ही सोचकर उन्हें अभिमानपूर्वक उत्तर दिया—‘राजन्! तुम इस युद्धमें चुपचाप खड़े रहो। हमारे इन्द्र तो प्रह्लाद ही होंगे। इनके लिये हम विजय करनेको प्रस्तुत हैं।’ देवताओंने फिर कहा—‘राजन्! तुम दैत्यपक्षको जीतकर देवेन्द्र हो सकते हो।’ तब रजिने उन सब दानवोंका, जो देवराज इन्द्रके लिये अवध्य थे, संहार कर डाला और देवताओंकी नष्ट हुई सम्पत्तिको पुनः उनसे छीन लिया। उस समय देवताओंसहित इन्द्र महाराज रजिके पास आये और अपनेको उनका पुत्र घोषित करते हुए बोले—‘तात! आप निःसंदेह हम सब लोगोंके इन्द्र हैं, क्योंकि मैं इन्द्र आजसे आपका पुत्र कहलाऊँगा।’ इन्द्रकी बात सुनकर उनकी मायासे वञ्चित हो महाराज रजिने ‘तथास्तु’ कह दिया। वे इन्द्रपर बहुत प्रसन्न थे।

रम्भके कोई पुत्र नहीं था। अब अनेनाके वंशका वर्णन करूँगा। अनेनाके पुत्र महायशस्वी राजा प्रतिक्षत्र हुए। प्रतिक्षत्रके पुत्र संजय, संजयके जय, जयके विजय, विजयके कृति, कृतिके हर्यश्व, हर्यश्वके प्रतापी सहदेव, सहदेवके धर्मात्मा