संक्षिप्त ब्रह्मपुराण
Brahma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- श्रीकृष्णकी संतति, अनिरुद्धके विवाहमें रुक्मीका वध तथा इन्द्रकी पराजय * ३२९
आप अज्ञानवश ही इसे ले जानेकी अभिलाषा करते हैं। भला, इस पारिजातको लेकर कौन कुशलसे जा सकता है। देवराज इन्द्र इसका बदला लेनेके लिये अवश्य आयेंगे। जब वे हाथमें वज्र लेकर आगे बढ़ेंगे, तब सम्पूर्ण देवता भी उनका साथ देंगे; अतः सम्पूर्ण देवताओंके साथ आपको विवाद करनेसे क्या लाभ। अच्युत ! जिस कार्यका परिणाम कटु हो, उसकी विद्वान् पुरुष प्रशंसा नहीं करते।'
वनरक्षकोंके यों कहनेपर सत्यभामा देवी अत्यन्त कुपित होकर बोलीं—'शची अथवा देवराज इन्द्र इस पारिजातको लेनेवाले कौन होते हैं। यदि यह अमृतमन्थनके समय समुद्रसे निकला है, तब तो इसपर सम्पूर्ण लोकोंका समान अधिकार है। इसे इन्द्र अकेले कैसे ले सकते हैं। यदि अपने पतिकी भुजाओंके बलका अधिक घमंड होनेके कारण शची इस वृक्षको रोकती है तो तुमलोग शीघ्र शचीके पास जाकर मेरी यह बात कहो—'सत्यभामा अपने पतिपर गर्व करके धृष्टतापूर्वक कहती है कि यदि तुम अपने पतिको अत्यन्त प्रिय हो तो पारिजात वृक्षको लेकर जाते हुए मेरे पतिको उनके द्वारा रोको।'
यह सुनकर रक्षकोंने शचीके पास जा सत्यभामाकी कही हुई सारी बातें ज्यों-की-त्यों सुना दीं। शचीने भी अपने स्वामी देवराज इन्द्रको युद्धके लिये उत्साहित किया। तब इन्द्र पारिजातके लिये सम्पूर्ण देवसेनाको साथ ले श्रीहरिसे युद्ध करनेको उद्यत हुए। जब इन्द्र हाथमें वज्र लेकर युद्ध करनेके लिये खड़े हुए, तब समस्त देवता भी परिघ, खड्ग, गदा और शूल आदि आयुधोंके साथ तैयार हो गये। भगवान् श्रीकृष्णने देखा इन्द्र ऐरावतपर सवार हो देवपरिवारको साथ ले युद्धके लिये उपस्थित हैं; तब उन्होंने पाञ्चजन्य शङ्ख बजाया। उसकी ध्वनिसे सम्पूर्ण दिशाएँ गूँज उठीं। साथ ही उन्होंने सहस्रों और लाखों बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी। उन बाणोंसे सम्पूर्ण दिशाएँ और आकाश आच्छादित हो गये। यह देख सम्पूर्ण देवता भी अनेक प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंकी वर्षा करने लगे। सम्पूर्ण जगत्के स्वामी भगवान् मधुसूदनने देवताओंके छोड़े हुए एक-एक अस्त्र-शस्त्रके खेल-खेलमें ही हजारों टुकड़े कर डाले। पक्षिराज गरुड़ने वरुणके पाशको खींच लिया और छोटे-छोटे साँपोंके शरीरकी भाँति उसके खण्ड-खण्ड कर डाले। भगवान् देवकीनन्दनने यमराजके चलाये हुए दण्डको गदाकी मारसे टूक-टूक करके पृथ्वीपर गिरा दिया। कुबेरकी शिबिकाको चक्रसे तिल-तिल करके काट डाला। सूर्य और चन्द्रमा उनकी दृष्टि पड़ते ही अपना तेज और प्रभाव खो बैठे। अग्निदेवके सैकड़ों टुकड़े हो गये। आठों वसुओंने भगवान्के बाणोंकी चोट खाकर आठों दिशाओंकी शरण ली। ग्यारह रुद्र भी धराशायी हो गये। उनके त्रिशूलोंके अग्रभाग चक्रकी धारसे छिन्न-भिन्न हो गये। साध्य, विश्वेदेव, मरुद्गण और गन्धर्व शार्ङ्गधनुर्धारी भगवान् श्रीकृष्णके बाणोंसे आहत हो सेमरकी रूईके समान आकाशमें उड़ने लगे। गरुड़ तो सदा आकाशमें ही चलनेवाले ठहरे। उन्होंने चोंचसे, पंखोंसे और पंजोंसे भी देवताओं और दानवोंको घायल कर डाला।
तदनन्तर देवराज इन्द्र और भगवान् मधुसूदन एक-दूसरेपर हजार-हजार बाणोंकी वृष्टि करने लगे, मानो दो मेघ परस्पर जलकी धाराएँ बरसाते हों। ऐरावत और गरुड़में घमासान युद्ध होने लगा। जब सब प्रकारके अस्त्र-शस्त्र कटकर गिर गये, तब इन्द्रने वज्र और श्रीकृष्णने सुदर्शन चक्र हाथमें लिया। उन दोनोंको वज्र और चक्र हाथमें लिये देख चराचर जीवोंसहित सम्पूर्ण त्रिलोकीमें