संक्षिप्त ब्रह्मपुराण
Brahma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- भगवान् श्रीकृष्णका सोलह हजार स्त्रियोंसे विवाह और उनकी संतति * ३३३
महाबली प्रमथोंके साथ उनका युद्ध हुआ। श्रीहरि उन सबका संहार करके बाणासुरके भवनके निकट गये। तत्पश्चात् तीन पैर और तीन मस्तकवाले माहेश्वर ज्वरने बाणासुरकी रक्षाके लिये शार्ङ्गधन्वा श्रीकृष्णके साथ युद्ध किया। उसके फेंके हुए भस्मके स्पर्शसे श्रीकृष्णका शरीर संतप्त हो उठा और उससे छू जानेपर बलदेवजीने भी शिथिल होकर अपने नेत्र मूूँद लिये। इस प्रकार श्रीकृष्णके साथ युद्ध करते हुए माहेश्वर ज्वरपर शीघ्र ही वैष्णव ज्वरने आक्रमण किया और उसको भगवान्के शरीरसे बाहर निकाल दिया। उस समय भगवान् नारायणकी भुजाओंके आघातसे माहेश्वर ज्वरको बड़ी पीड़ा हुई। वह व्याकुल हो उठा। यह देख पितामह ब्रह्माजीने आकर कहा—'भगवन् ! इसे क्षमा कीजिये।' भगवान् बोले—'अच्छा, मैंने क्षमा कर दिया।' यों कहकर उन्होंने वैष्णव ज्वरको अपनेमें ही लीन कर लिया। तब माहेश्वर ज्वरने कहा—'भगवन् ! जो मनुष्य आपके साथ मेरे युद्धका स्मरण करेंगे, वे ज्वरहीन हो जायँगे।' यों कहकर वह चला गया।
तदनन्तर भगवान् श्रीकृष्णने पाँच अग्नियोंको जीतकर उन्हें नष्ट कर डाला और दानवोंकी सेनाका खेल-खेलमें ही विध्वंस कर दिया, यह देख बलिकुमार बाणासुर सम्पूर्ण दैत्योंकी सेना साथ ले भगवान्से युद्ध करने लगा। भगवान् शिव तथा कार्तिकेयजीने भी उसका साथ दिया। श्रीहरि तथा शंकरजीमें बड़ा भयंकर युद्ध हुआ। उनके चलाये हुए नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंकी मारसे पीड़ित हो समस्त लोक क्षुब्ध हो उठे। उस महायुद्धको होते देख देवताओंने समझा 'निश्चय ही समस्त संसारके लिये प्रलयकाल आ गया।' तब भगवान् श्रीकृष्णने जृम्भणास्त्रके द्वारा शंकरजीको स्तब्ध कर दिया। वे युद्ध छोड़कर जँभाई लेने लगे। यह देख दैत्य और प्रमथगण चारों दिशाओंमें भाग गये। भगवान् शंकर जृम्भासे विवश हो रथके पिछले भागमें बैठ गये। उस समय वे अनायास ही सब कुछ करनेवाले श्रीकृष्णके साथ युद्ध न कर सके। गरुडने कार्तिकेयकी भुजाओंको क्षत-विक्षत कर दिया। प्रद्युम्नने भी अपने अस्त्र-शस्त्रोंसे उन्हें पीड़ित किया तथा श्रीकृष्णके हुंकारसे उनकी शक्ति नष्ट हो गयी; अतः वे युद्धसे भाग गये।
इस प्रकार जब महादेवजी जँभाई लेने लगे, दैत्यसेना नष्ट हो गयी, कार्तिकेयजी परास्त हो गये और प्रमथों (रुद्रके गणों)-का संहार हो गया, तब श्रीकृष्ण, प्रद्युम्न और बलरामजीके साथ युद्ध करनेके लिये एक विशाल रथपर आरूढ़ हो बाणासुर वहाँ आया। साक्षात् नन्दीश्वर सारथि बनकर उसके घोड़ोंकी बागडोर सँभाले हुए थे। महापराक्रमी बलभद्र और प्रद्युम्नने अनेकों बाणोंसे बाणासुरकी सेनाको बींध डाला। वह सेना वीरधर्मसे भ्रष्ट होकर रणभूमिसे भागने लगी। बाणासुरने देखा उसकी सेनाको बलरामजी हलसे खींचकर मूसलसे मारते हैं और भगवान् श्रीकृष्ण भी उसे अपने बाणोंका निशाना बनाते हैं। तब उसका श्रीकृष्णके साथ घमासान युद्ध छिड़ गया। दोनों एक-दूसरेपर कवचको भी छेद डालनेवाले तेजस्वी बाण छोड़ने लगे। भगवान् श्रीकृष्णने बाणासुरके चलाये हुए बाणोंको अपने सायकोंसे छिन्न-भिन्न कर डाला। फिर बाणासुरने श्रीकृष्णको और श्रीकृष्णने बाणासुरको घायल किया। दोनों एक-दूसरेको जीतनेकी इच्छासे परस्पर अस्त्र-शस्त्रोंकी बौछार कर रहे थे। जब सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्र छिन्न-भिन्न हो गये तब भगवान् श्रीकृष्णने बाणासुरको मारनेका निश्चय किया। उन्होंने सैकड़ों सूर्योंके समान तेजस्वी सुदर्शन चक्र हाथमें लिया और बाणासुरको लक्ष्य करके चला दिया। वे