भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

Brahma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished434 पृष्ठ

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पृष्ठ 35
  • आयु और नहुषके वंशका वर्णन, रजि एवं ययातिको चरित्र * ३३

मिलेगा।' तत्पश्चात् ययातिने क्रमशः द्रुह्यु, तुर्वसु तथा अनुसे भी यही बात कही; परन्तु उन्होंने भी युवावस्था देनेसे इन्कार कर दिया। तब ययातिने अत्यन्त क्रोधमें भरकर उन सबको भी पूर्ववत् शाप दे दिया। इस प्रकार सबको शाप दे राजाने अपने छोटे पुत्र पूरुसे भी वही प्रस्ताव किया— 'वत्स! यदि तुम्हें स्वीकार हो तो अपना बुढ़ापा तुम्हें देकर और तुम्हारी युवावस्था स्वयं लेकर इस पृथ्वीपर विचरूँ।' पिताकी आज्ञाके अनुसार प्रतापी पूरुने उनका बुढ़ापा ले लिया। ययाति भी पूरुके तरुण रूपसे पृथ्वीपर विचरने लगे। वे कामनाओंका अन्त ढूँढ़ते हुए चैत्ररथ नामक वनमें गये और वहाँ विश्वाची नामक अप्सराके साथ रमण करने लगे। जब काम और भोगसे तृप्त हो चुके, तब पूरुके समीप जाकर उन्होंने अपना बुढ़ापा ले लिया। उस समय ययातिने जो उद्गार प्रकट किया, उसपर ध्यान देनेसे मनुष्य सब भोगोंकी ओरसे अपने मनको उसी प्रकार हटा सकता है, जैसे कछुआ अपने अङ्गोंको सब ओरसे समेट लेता है। ययाति बोले—

न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति।
हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्धते ॥
यत्पृथिव्यां व्रीहियवं हिरण्यं पशवः स्त्रियः।
नालमेकस्य तत्सर्वमिति कृत्वा न मुह्यति ॥
यदा भावं न कुरुते सर्वभूतेषु पापकम्।
कर्मणा मनसा वाचा ब्रह्म सम्पद्यते तदा ॥
यदा तेभ्यो न बिभेति यदा चास्मान्न बिभ्यति।
यदा नेच्छति न द्वेष्टि ब्रह्म सम्पद्यते तदा ॥
या दुस्त्यजा दुर्मतिभिर्या न जीर्यति जीर्यतः।
योऽसौ प्राणान्तिको रोगस्तां तृष्णां त्यजतः सुखम् ॥
जीर्यन्ति जीर्यतः केशा दन्ता जीर्यन्ति जीर्यतः।
धनाशा जीविताशा च जीर्यतोऽपि न जीर्यति ॥
यच्च कामसुखं लोके यच्च दिव्यं महत्सुखम्।
तृष्णाक्षयसुखस्यैते नार्हन्ति षोडशीं कलाम् ॥
(१२।४०—४६)

'भोगोंकी इच्छा उन्हें भोगनेसे कभी शान्त नहीं होती, अपितु घीसे आगकी भाँति और भी बढ़ती ही जाती है। इस पृथ्वीपर जितने भी धान, जौ, सुवर्ण, पशु तथा स्त्रियाँ हैं, वे सब एक