संक्षिप्त ब्रह्मपुराण
Brahma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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* संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *
देवि ! जन्मसे ब्राह्मण होनेपर भी जो दुराचारी और समस्त वर्णसंकरोंका अन्न भोजन करनेवाला है, वह ब्राह्मणत्वको त्यागकर वैसा ही शूद्र हो जाता है। इसी प्रकार शुद्धात्मा एवं जितेन्द्रिय शूद्र भी शुद्ध कर्मोंके अनुष्ठानसे ब्राह्मणकी भाँति सेवन करने योग्य हो जाता है, यह साक्षात् ब्रह्माजीका कथन है। जो शूद्र अपने स्वभाव और कर्मके अनुसार जीवन बिताता है, उसे द्विजातियोंसे भी अधिक शुद्ध जानना चाहिये—ऐसा मेरा विश्वास है। जन्म, संस्कार, वेदाध्ययन और संतति—ये सब द्विजत्वके कारण नहीं हैं; द्विजत्वका मुख्य कारण तो सदाचार ही है। संसारमें ये सब लोग आचरणसे ही ब्राह्मण माने जाते हैं। उत्तम आचरणमें स्थित होनेपर शूद्र भी ब्राह्मणत्वको प्राप्त हो सकता है।* पार्वती ! ब्रह्मस्वभाव सर्वत्र सम है—यह मेरी मान्यता है। जहाँ निर्गुण एवं निर्मल ब्रह्म स्थित है, वहीं द्विजत्व है। देवि ! ये जो विमल स्वभाववाले पुरुष हैं, वे ब्रह्मके ही स्थान और भावका दर्शन करानेवाले हैं। प्रजाकी सृष्टि करते समय वरदायक भगवान् ब्रह्माने स्वयं ही ऐसी बात कही थी। ब्राह्मण इस संसारमें एक महान् क्षेत्र है, जो हाथ-पैरोंसे युक्त होकर सर्वत्र विचरता रहता है। इसमें जो बीज पड़ता है, वह परलोकमें फल देनेवाली खेती है। ब्राह्मणको सदा संतुष्ट एवं सन्मार्गका पथिक होना चाहिये। उन्नति चाहनेवाले द्विजको सदा ब्रह्ममार्गका अवलम्बन करके रहना चाहिये। गृहस्थ ब्राह्मणको घरपर रहते हुए प्रतिदिन संहिताके मन्त्रोंका अध्ययन और स्वाध्याय करना चाहिये। वह अध्ययनकी वृत्तिसे ही जीवन-निर्वाह करे। जो ब्राह्मण इस प्रकार सदा सन्मार्गमें स्थित हो अग्निहोत्र और स्वाध्याय करता है, वह ब्रह्मभावको प्राप्त होता है। देवि ! ब्राह्मणत्वको प्राप्त करके उसकी यत्नपूर्वक रक्षा करनी चाहिये। यह मैंने तुम्हें बड़ी गोपनीय बात बतलायी है। शूद्र धर्माचरणसे ब्राह्मण होता है और ब्राह्मण धर्मभ्रष्ट होनेपर शूद्रत्वको प्राप्त होता है।
स्वर्ग और नरकमें ले जानेवाले धर्माधर्मका निरूपण
पार्वतीजीने कहा— भगवन् ! सर्वभूतेश्वर ! देव-दानव-वन्दित विभो ! मुझे मनुष्योंके धर्म और अधर्मके विषयमें संदेह है। देव ! आप उसका समाधान कीजिये। देहधारी जीव सदा मन, वाणी और क्रियारूप त्रिविध बन्धनोंद्वारा बँधते हैं; फिर किन साधनोंसे और किस प्रकार उनकी मुक्ति होती है? यह बताइये। देव ! किस स्वभावसे, कैसे कर्मसे अथवा किन सदाचारों एव सद्गुणोंसे संसारके मनुष्य स्वर्गलोकमें जाते हैं?
शिवजी बोले— देवि ! तुम धर्म और अर्थके तत्त्वको जाननेवाली और निरन्तर धर्ममें तत्पर रहनेवाली हो। तुम्हारा प्रश्न सब प्राणियोंके लिये हितकारी और उनकी बुद्धिको बढ़ानेवाला है। मैं उसका उत्तर देता हूँ, सुनो। जो मनुष्य सब प्रकारके
* ब्राह्मणो वाप्यसद्वृत्तः सर्वसंकरभोजनः ॥
स ब्राह्मण्यं समुत्सृज्य शूद्रो भवति तादृशः। कर्मभिः शुचिभिर्देवि शुद्धात्मा विजितेन्द्रियः ॥
शूद्रोऽपि द्विजवत्सेव्य इति ब्रह्माब्रवीत्स्वयम् । स्वभावकर्मणा चैव यश्च शूद्रोऽधितिष्ठति ॥
विशुद्धः स द्विजातिभ्यो विज्ञेय इति मे मतिः। न योनिर्नापि संस्कारो न श्रुतिर्न च संततिः ॥
कारणानि द्विजत्वस्य वृत्तमेव तु कारणम्। सर्वोऽयं ब्राह्मणो लोके वृत्तेन तु विधीयते ॥
वृत्ते स्थितश्च शूद्रोऽपि ब्राह्मणत्वं च गच्छति। (२२३।५३–५८)