भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

Brahma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished434 पृष्ठ

पृष्ठ 398, कुल 434 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 398

३९६ * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *


ब्राह्मणों तथा श्रेष्ठ पूजन-सामग्रियोंके साथ भगवान्‌की सेवामें उपस्थित हो सनातन ब्रह्माजीकी भाँति उनका यथायोग्य पूजन करें। जो मेरा तथा पितामह ब्रह्माका दर्शन करना चाहता हो, उसे परम प्रतापी भगवान् वासुदेवका दर्शन अवश्य करना चाहिये। उनका दर्शन होनेसे ही मेरा भी दर्शन हो जाता है—इसमें कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये। तपोधनो! भगवान् वासुदेव ही ब्रह्मा हैं, ऐसा जानो। जिनपर कमलनयन भगवान् विष्णु प्रसन्न होंगे, उनपर ब्रह्मासहित सम्पूर्ण देवता भी प्रसन्न हो जायँगे। संसारमें जो मानव भगवान् केशवकी शरण लेगा, उसे कीर्ति, यश और स्वर्गकी प्राप्ति होगी। इतना ही नहीं, वह धर्मात्मा होनेके साथ ही धर्मका उपदेश करनेवाला आचार्य होगा।

महातेजस्वी भगवान् विष्णुने प्रजावर्गका हित करनेकी इच्छासे धर्मानुष्ठानके लिये कोटि-कोटि ऋषियोंको उत्पन्न किया। वे सनत्कुमार आदि ऋषि गन्धमादन पर्वतपर विधिपूर्वक तपस्यामें संलग्न हैं। इसलिये धर्मज्ञ एवं प्रवचन-कुशल भगवान् विष्णु सबके लिये नमस्कार करनेयोग्य हैं। वे वन्दित होनेपर स्वयं वन्दना करते हैं और सम्मानित होनेपर स्वयं भी सम्मान देते हैं। जो प्रतिदिन उनका दर्शन करता है, उसपर वे भी सदा कृपादृष्टि रखते हैं। जो उनकी शरणमें जाता है, उसकी ओर वे भी बढ़ आते हैं। जो उनकी अर्चना करता है, उसकी वे भी सदा अर्चना करते हैं। इस प्रकार आदिदेव भगवान् विष्णु अनिन्द्य हैं।

साधु पुरुषोंने उनकी आराधनाके लिये बड़ी भारी तपस्या की है। देवताओंने भी सनातन देव श्रीहरिका सदा ही पूजन किया है। भगवान्‌के अनुरूप निर्भयतासे युक्त हो उनकी शरणमें जाकर उनकी आराधनामें मन लगाया है। सम्पूर्ण द्विजोंको चाहिये कि वे मन, वाणी और क्रियाद्वारा भगवान् देवकी-नन्दनकी सेवामें उपस्थित हो यत्नपूर्वक उनका दर्शन और नमस्कार करें। मुनिवरो! मैंने इसी मार्गका अनुष्ठान किया है। उन सर्वदेवेश्वर भगवान्‌का दर्शन कर लेनेपर सम्पूर्ण देवताओंका दर्शन हो जाता है। उन महावराहरूपधारी सर्वलोकपितामह जगत्पति भगवान् विष्णुको मैं नित्यप्रति प्रणाम करता हूँ। उन्हीं श्रीकृष्णके बड़े भाई हलधर बलरामजी होंगे, जिनका श्वेतगिरिके समान गौर वर्ण होगा। इस पृथ्वीको धारण करनेवाले शेषनाग ही उनके रूपमें अवतीर्ण होंगे। वे भगवान् शेष बड़ी प्रसन्नताके साथ सर्वत्र विचरण करते हैं। वे अपने फणसे पृथ्वीको लपेट करके स्थित हैं। ये जो भगवान् विष्णु कहलाते हैं, वे ही इस पृथ्वीको धारण करनेवाले भगवान् अनन्त हैं। जो बलराम हैं, वही समस्त इन्द्रियोंके स्वामी धरणीधर अच्युत हैं। वे दोनों पुरुषसिंह दिव्य रूप एवं दिव्य पराक्रमी हैं। उन दोनोंका दर्शन और आदर करना चाहिये। वे क्रमशः चक्र और हल धारण करनेवाले हैं। तपोधनो! मैंने तुमलोगोंसे भगवान्‌के अनुग्रहका यह उपाय बताया है, अतः तुम सब लोग प्रयत्नपूर्वक यदुश्रेष्ठ भगवान् वासुदेवका पूजन करो।


श्रीवासुदेवके पूजनकी महिमा तथा एकादशीको भगवान्‌के मन्दिरमें जागरण करनेका माहात्म्य—ब्रह्मराक्षस और चाण्डालकी कथा

मुनियोंने कहा— महर्षे! हमने भगवान् श्रीकृष्णका अद्भुत माहात्म्य सुना। वह सब पापोंको दूर करनेवाला, पुण्यमय, धन्य एवं संसारबन्धनका नाश करनेवाला है। महामुने! श्रीवासुदेवके पूजनमें संलग्न रहनेवाले मनुष्य उनका विधिपूर्वक भक्तिभावसे पूजन करके किस गतिको प्राप्त होते हैं?

संक्षिप्त ब्रह्मपुराण · पृष्ठ 398, कुल 434 में से · BharatKosha