भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

Brahma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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  • श्रीवासुदेवके पूजनकी महिमा तथा एकादशीको भगवान्के मन्दिरमें जागरण करनेका माहात्म्य * ३९१

दे दिये। ब्राह्मणने उन्हें जलसे धोकर उनके द्वारा भगवान् विष्णुका पूजन किया और अपने घरकी राह ली; किंतु चाण्डालने मन्दिरके बाहर ही भूमिपर बैठकर उपवासपूर्वक गीत गाते हुए रातभर जागरण किया। रात बीती, सबेरा हुआ और चाण्डालने स्नान करके भगवान्‌को नमस्कार किया; फिर अपनी प्रतिज्ञा सत्य करनेके लिये वह राक्षसके पास चल दिया। उसे जाते देख किसी मनुष्यने पूछा—‘भद्र! कहाँ जाते हो?’ चाण्डालने सब बातें कह सुनायीं। तब वह मनुष्य फिर बोला—‘यह शरीर धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—चारों पुरुषार्थोंका साधन है; अतः विद्वान् पुरुषको बड़े यत्नसे इसका पालन करना चाहिये। मनुष्य जीवित रहे तो वह धर्म, अर्थ, सुख और श्रेष्ठ मोक्ष-गतिको प्राप्त कर लेता है। जीवित रहनेपर वह कीर्तिका भी उपार्जन करता है। संसारमें मरे हुए मनुष्यकी कोई चर्चा ही नहीं करता।’ उसकी बात सुनकर चाण्डालने युक्तियुक्त वचनोंमें उत्तर दिया—‘भद्र! मैंने शपथ खायी है, अतः सत्यको आगे करके राक्षसके पास जाता हूँ।’ तब उस मनुष्यने फिर कहा—‘साधो! तुम ऐसी मूर्खता क्यों करते हो? क्या तुमने मनुजीका यह वचन नहीं सुना है—‘गौ, स्त्री और ब्राह्मणकी रक्षाके लिये, विवाहके समय, रतिके प्रसङ्गमें, प्राण-संकटकालमें, सर्वस्वका अपहरण होते समय—इन पाँच अवसरोंपर असत्यभाषणसे पाप नहीं लगता।’*

उस मनुष्यका कथन सुनकर चाण्डालने पुनः उत्तर दिया—‘आपका कल्याण हो, आप ऐसी बात मुँहसे न निकालें। संसारमें सत्यका ही आदर होता है। भूतलपर जो कुछ भी सुख-सामग्री है, वह सत्यसे ही प्राप्त होती है। सत्यसे ही सूर्य तपता है, सत्यसे ही जलमें रसकी स्थिति है, सत्यसे ही आग जलती और सत्यसे ही वायु चलती है। मनुष्योंको सत्यसे ही धर्म, अर्थ, काम और दुर्लभ मोक्षकी प्राप्ति होती है; अतः सत्यका परित्याग न करे। लोकमें सत्य ही परब्रह्म है, यज्ञोंमें भी सत्य ही सबसे उत्तम है तथा सत्य स्वर्गसे आया हुआ है; इसलिये सत्यको कभी नहीं छोड़ना चाहिये।’†

यों कहकर वह चाण्डाल उस मनुष्यको चुप कराकर उस स्थानपर गया, जहाँ प्राणियोंका वध करनेवाला ब्रह्मराक्षस रहता था। चाण्डालको आया देख ब्रह्मराक्षसके नेत्र आश्चर्यसे चकित हो उठे।


* गोस्त्रीद्विजानां परिरक्षणार्थं विवाहकाले सुरतप्रसङ्गे। प्राणात्यये सर्वधनापहारे पञ्चानृतान्याहुरपातकानि ॥ (२२७।५०)
† सत्येनार्कः प्रतपति सत्येनापो रसात्मिकाः। ज्वलत्यग्निश्च सत्येन वाति सत्येन मारुतः ॥
धर्मार्थकामसम्प्राप्तिर्मोक्षप्राप्तिश्च दुर्लभा। सत्येन जायते पुंसां तस्मात् सत्यं न संत्यजेत् ॥
सत्यं ब्रह्म परं लोके सत्यं यज्ञेषु चोत्तमम्। सत्यं स्वर्गसमायातं तस्मात् सत्यं न संत्यजेत् ॥ (२२७।५३–५५)