संक्षिप्त ब्रह्मपुराण
Brahma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- तीर्थ-वर्णन * ६१
कामदतीर्थ, रुद्रकोटि, सुमनस्तीर्थ, समन्तपञ्चक, ब्रह्मतीर्थ, सुदर्शनतीर्थ, पारिप्लव, पृथूदक, दशाश्वमेधिक, साक्षिद, विजय, पञ्चनद, वाराह, यक्षिणीह्रद, पुण्डरीक, सोमतीर्थ, मुञ्जवट, बदरीवन, रत्नमूलक, स्वर्लोकद्वार, पञ्चतीर्थ, कपिलातीर्थ, सूर्यतीर्थ, शङ्खिनीतीर्थ, गोभवनतीर्थ, यक्षराजतीर्थ, ब्रह्मावर्त, कामेश्वर, मातृतीर्थ, शीतवनतीर्थ, स्नानलोमापह, माससंसरक, केदार, ब्रह्मोदुम्बर, सप्तर्षिकुण्ड, देवीतीर्थ, जम्बुकतीर्थ, ईहास्पद, कोटिकूट, किंदान, किंजय, कारण्डव, अवेध्य, त्रिविष्टप, पाणिखात, मिश्रक, मधुवट, मनोजव, कौशिकीतीर्थ, देवतीर्थ, ऋणमोचनतीर्थ, नृग्धूम, अमरह्रद, श्रीकुञ्ज, शालितीर्थ, नैमिषेयतीर्थ, ब्रह्मस्थान, कन्यातीर्थ, मनसतीर्थ, कारुपावनतीर्थ, सौगन्धिकवन, मणितीर्थ, सरस्वतीतीर्थ, ईशानतीर्थ, पाञ्चयज्ञिकतीर्थ, त्रिशूलधार, माहेन्द्र, देवस्थान, कृतालय, शाकम्भरी, देवतीर्थ, सुवर्णतीर्थ, कलिह्रद, क्षीरस्रव, विरूपाक्ष, भृगुतीर्थ, कुशोद्भवतीर्थ, ब्रह्मयोनि, नीलपर्वत, कुब्जाम्बक, वसिष्ठपद, स्वर्गद्वार, प्रजाद्वार, कलिकाश्रम, रुद्रावर्त, सुगन्धाश्व, कपिलावन, भद्रकर्णह्रद, शङ्कुकर्णह्रद, सप्तसारस्वत, औशनसतीर्थ, कपालमोचन, अवकीर्ण, काम्यक, चतुःसामुद्रिक, शतिक, सहस्रिक, रेणुक, पञ्चवटक, विमोचन, स्थाणुतीर्थ, कुरुतीर्थ, कुशध्वज, विश्वेश्वर, मानवकूप, नारायणाश्रम, गङ्गाह्रद, बदरीपावन, इन्द्रमार्ग, एकरात्र, क्षीरकावास, दधीच, श्रुततीर्थ, कोटितीर्थस्थली, भद्रकालीह्रद, अरुन्धतीवन, ब्रह्मावर्त, अश्ववेदी, कुब्जावन, यमुनाप्रभव, वीर, प्रमोक्ष, सिन्धूत्थ, ऋषिकुल्या, कृत्तिका, उर्वीसंक्रमण, मायाविद्योद्भव, महाश्रम, वेतसिका, सुन्दरिकाश्रम, बाहुतीर्थ, चारुनदी, विमलाशोक, मार्कण्डेयतीर्थ, सितोद, मत्स्योदरी, सूर्यप्रभ, अशोकवन, अरुणास्पद, शुक्रतीर्थ, वालुकातीर्थ, पिशाचमोचन, सुभद्राह्रद, विरलदण्डकुण्ड, चण्डेश्वरतीर्थ, ज्येष्ठस्थानह्रद, ब्रह्मसर, जैगीषव्यगुहा, हरिकेशवन, अजामुखसर, घण्टाकर्णह्रद, कर्कोटकवापी, सपर्णास्योदपान, श्वेततीर्थह्रद, घर्घिरिकाकुण्ड, श्यामाकूप, चन्द्रिकातीर्थ, श्मशानस्तम्भकूप, विनायकह्रद, सिन्धूद्भवकूप, ब्रह्मसर, रुद्रावास, नागतीर्थ, पुलोमतीर्थ, भक्तह्रद, क्षीरसर, प्रेताधार, कुमारतीर्थ, कुशावर्त, दधिकर्णोदपानक, शृङ्गीतीर्थ, महातीर्थ, महानदी, गयशीर्ष, अक्षयवट, कपिलाह्रद, गृध्रवट, सावित्रीह्रद, प्रभासन, शीतवन, योनिद्वार, धन्यक, कोकिलातीर्थ, मतङ्गह्रद, पितृकूप, सप्तकुण्ड, मणिरत्नह्रद, कौशिक्यतीर्थ, भरततीर्थ, ज्येष्ठालीकातीर्थ, कल्पसर, कुमारधारा, श्रीधारा, गौरीशिखर, शुनःकुण्ड, नन्दितीर्थ, कुमारवास, श्रीवास, कुम्भकर्णह्रद, कौशिकीह्रद, धर्मतीर्थ, कामतीर्थ, उद्दालकतीर्थ, संध्यातीर्थ, लोहितार्णव, शोणोद्भव, वंशगुल्म, ऋषभ, कालतीर्थ, पुण्यावर्तिह्रद, बदरिकाश्रम, रामतीर्थ, पितृवन, विरजातीर्थ, कृष्णतीर्थ, कृष्णवट, रोहिणीकूप, इन्द्रद्युम्नसरोवर, सानुगर्त, माहेन्द्र, श्रीनद, इषुतीर्थ, वार्षभतीर्थ, कावेरीह्रद, गोकर्ण, गायत्रीस्थान, बदरीह्रद, मध्यस्थान, विकर्णक, जातीह्रद, देवकूप, कुशप्रथन, सर्वदेवव्रत, कन्याश्रमह्रद, वालखिल्यह्रद तथा अखण्डितह्रद—ये सब पवित्र तीर्थ हैं। जो मनुष्य इन तीर्थोंमें उत्तम श्रद्धासे सम्पन्न हो उपवास एवं इन्द्रियसयंमपूर्वक विधिवत् स्नान, देवता, ऋषि, मनुष्य तथा पितरोंका तर्पण, देवताओंका पूजन एवं तीन रात्रितक निवास करता है, वह प्रत्येक तीर्थके पृथक्-पृथक् फलरूपसे अश्वमेध-यज्ञका पुण्य प्राप्त करता है—इसमें तनिक भी संदेह नहीं है। जो प्रतिदिन इस उत्तम तीर्थ-माहात्म्यको सुनता, पढ़ता अथवा सुनाता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है।