संक्षिप्त ब्रह्मपुराण
Brahma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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चक्षु, निष्ठीवा, गण्डकी तथा कौशिकी। ये हिमालयकी घाटीसे निकली हुई नदियाँ हैं। देवस्मृति, देववती, वातघ्नी, सिन्धु, वेण्या, चन्दना, सदानीरा, मही, चर्मण्वती (चंबल), वृषी, विदिशा, वेदवती, क्षिप्रा तथा अवन्ती—ये पारियात्रपर्वतका अनुसरण करनेवाली नदियाँ हैं। शोणा (सोन), महानदी, नर्मदा, सुरथा, क्रिया, मन्दाकिनी, दशार्णा, चित्रकूटा, चित्रोत्पला, वेत्रवती (बेतवा), कर्मोदा, पिशाचिका, अतिलघुश्रेणी, विपाप्मा, शैवला, सधेरुजा, शक्तिमती, शकुनी, त्रिदिवा, क्रमु तथा वेगवाहिनी—ये नदियाँ ऋक्षपर्वतकी संतानें हैं। चित्रा, पयोष्णी, निर्विन्ध्या, तापी, वेणा, वैतरणी, सिनीवाली, कुमुद्वती, तोया, महागौरी, दुर्गा तथा अन्तश्शिला—ये पुण्यसलिला सरिताएँ विन्ध्याचलकी घाटियोंसे निकली हैं। गोदावरी, भीमरथी, कृष्णवेणा, तुङ्गभद्रा, सुप्रयोगा तथा पापनाशिनी—ये श्रेष्ठ नदियाँ सह्यगिरिकी शाखासे प्रकट हुई हैं। कृतमाला, ताम्रपर्णी, पुष्पवती, उत्पलावती—ये शीतल जलवाली पवित्र नदियाँ मलयाचलसे निकली हैं। पितृकुल्या, सोमकुल्या, ऋषिकुल्या, वञ्जुला, त्रिदिवा, लाङ्गलिनी तथा वंशकरा—इनका प्राकट्य महेन्द्रपर्वतसे हुआ है। सुविकाला, कुमारी, मनुगा, मन्दगामिनी, क्षया और पलाशिनी—ये शक्तिमान्पर्वतसे निकली हैं।
समुद्रमें मिलनेवाली सभी नदियाँ पुण्यसलिला सरस्वती तथा गङ्गाके समान हैं। सभी इस विश्वकी जननी एवं पापहारिणी मानी गयी हैं। इनके अतिरिक्त भी सहस्रों छोटी-छोटी नदियाँ बतायी गयी हैं, जिनमेंसे कुछ तो केवल वर्षाकालमें बहती हैं और कुछ सदा ही जलसे पूर्ण रहती हैं। मत्स्य, मुकुटकुल्य, कुन्तल, काशी, कोसल, अन्ध्रक, कलिङ्ग, शमक तथा वृक—ये प्रायः मध्यदेशके जनपद बताये गये हैं। सह्य पर्वतके उत्तरका प्रदेश, जहाँ गोदावरी नदी बहती है, सम्पूर्ण भूमण्डलमें सर्वाधिक मनोरम है।
वानप्रस्थ और संन्यास-आश्रमके धर्मोंका पालन करनेसे जो फल होता है, कुआँ, बावली आदि खुदवाने, बगीचे लगाने, यज्ञ करने तथा अन्य शुभ कर्मोंके अनुष्ठानसे जो फल मिलता है, वह सब केवल भारतवर्षमें ही सुलभ है। ब्राह्मणो! भारतवर्षके समस्त गुणोंका वर्णन करनेमें कौन समर्थ हो सकता है? इस प्रकार मैंने भारतवर्षका वर्णन किया। यह सबसे उत्तम, सब पापोंका नाश करनेवाला, पवित्र, धन्य तथा बुद्धिको बढ़ानेवाला है। जो सदा अपनी इन्द्रियोंको वशमें रखकर इस प्रसंगका पाठ या श्रवण करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो भगवान् विष्णुके लोकमें जाता है।
कोणादित्यकी महिमा
**ब्रह्माजी कहते हैं—**भारतवर्षमें दक्षिणसमुद्रके किनारे ओण्ड्र देशके नामसे विख्यात एक प्रदेश है, जो स्वर्ग एवं मोक्ष देनेवाला है। समुद्रसे उत्तर विरज मण्डलतकका प्रदेश पुण्यात्माओंके सम्पूर्ण गुणोंद्वारा सुशोभित है। उस देशमें उत्पन्न जो जितेन्द्रिय ब्राह्मण तपस्या एवं स्वाध्यायमें संलग्न रहते हैं, वे सदा ही वन्दनीय एवं पूजनीय हैं। उस देशके
ब्राह्मण श्राद्ध, दान, विवाह, यज्ञ अथवा आचार्यकर्म—सभी कार्योंके लिये उत्तम हैं। वे षट्कर्मपरायण, वेदोंके पारंगत विद्वान्, इतिहासवेत्ता, पुराणार्थविशारद, सर्वशास्त्रार्थकुशल, यज्ञशील और राग-द्वेषसे रहित होते हैं। कोई वैदिक अग्निहोत्रमें लगे रहते और कोई स्मार्त अग्निकी उपासना करते हैं। वे स्त्री, पुत्र और धनसे सम्पन्न, दानी और सत्यवादी