वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र ३१ ] अध्याय १ ९९ तेषां ये यानि कर्माणि प्राक्सृष्ट्यां प्रतिपेदिरे। तान्येव ते प्रपद्यन्ते सृज्यमानाः पुनः पुनः॥ (महा०) 'पूर्वकल्पकी सृष्टिमें जिन्होंने जिन कर्मोंको अपनाया था, बादकी सृष्टिमें बार-बार रचे हुए वे प्राणी फिर उन्हीं कर्मोंको प्राप्त होते हैं।' इस प्रकार श्रुतियों तथा स्मृतियोंके वर्णनसे यह सिद्ध होता है कि कल्पान्तरमें उत्पन्न होनेवाले देवादिकोंके नाम, रूप पहलेके सदृश ही वेद- वचनानुसार रचे जाते हैं, इसलिये उनकी बार-बार आवृत्ति होती रहनेपर भी वेदकी नित्यता तथा प्रामाणिकतामें किसी प्रकारका विरोध नहीं आता है। सम्बन्ध— २६ वें सूत्रमें जो प्रसंगवश यह बात कही गयी थी कि ब्रह्मविद्यामें देवादिका भी अधिकार है; ऐसा वेदव्यासजी मानते हैं, उसीकी पुष्टि तीसवें सूत्रतक की गयी। अब आचार्य जैमिनिके मतानुसार यह बात कही जाती है कि ब्रह्मविद्यामें देवता आदिका अधिकार नहीं है— मध्वादिष्वसम्भवादनधिकारं जैमिनिः ॥ १ । ३ । ३१ ॥ जैमिनिः = जैमिनि नामक आचार्य; मध्वादिषु = मधु-विद्या आदिमें; अनधिकारम् (आह) = देवता आदिका अधिकार नहीं बताते हैं; असम्भवात् = क्योंकि यह सम्भव नहीं है। व्याख्या— छान्दोग्योपनिषद्के तीसरे अध्यायमें प्रथमसे लेकर ग्यारहवें खण्डतक मधुविद्याका प्रकरण है। वहाँ 'सूर्य' को देवताओंका 'मधु' बताया गया है। मनुष्योंके लिये साधनद्वारा प्राप्त होनेवाली वस्तु देवताओंको स्वतः प्राप्त है; इस कारण देवताओंके लिये मधुविद्या अनावश्यक है; अतः उस विद्यामें उनका अधिकार मानना सम्भव नहीं है। इसी प्रकार स्वर्गादि देवलोकके भोगोंकी प्राप्तिके लिये जो वेदोंमें यज्ञादिके द्वारा देवताओंकी सकाम उपासनाका वर्णन है, उसका अनुष्ठान भी देवताओंके लिये अनावश्यक होनेके कारण उनके द्वारा किया जाना सम्भव नहीं है। अतएव उसमें भी उनका अधिकार नहीं है, इसलिये यह सिद्ध होता है कि जैसे मनुष्योंके लिये यज्ञादि कर्मद्वारा स्वर्गादिकी प्राप्ति